अवध की गंगा-जमुनी सभ्यता पूरी दुनिया के लिए मिसाल है। इसका प्रभाव हिंदी और इससे जुड़ी क्षेत्रीय भाषाओं अवधी, ब्रज और भोजपुरी पर भी पड़ा। मुस्लिम लेखकों और कवियों ने हिंदी में भी अपना उत्कृष्ट योगदान दिया। इंशा अल्ला खां ‘इंशा’ की लिखी ‘रानी केतकी की कहानी’ (उदयभान चरित) को हिंदी की पहली गद्य रचना माना जाता है।
इसकी रचना 1803 में की गई जबकि 1841 में यह मुद्रित हुई। मुगल काल से लेकर अंग्रेजी शासन और फिर आजाद भारत में अब तक लखनऊ और आसपास जिलों में कई मुस्लिम लेखक और कवि ऐसे हुए हैं जिन्होंने हिंदी में अपनी रचनाओं के जरिए इस प्रवाह को अनवरत जारी रखा। इंशा अल्ला खां ‘इंशा’ (1756-1817) का जन्म तो पं. बंगाल की मुर्शिदाबाद में हुआ था लेकिन उनके पूर्वज दिल्ली आकर बस गए और फिर इंशा अल्ला लखनऊ आ गए।
हिंदी में कहानी की शुरुआत द्विवेदी युग से मानी जाती है। उनकी रचना ‘रानी केतकी की कहानी’ को हिंदी की पहली प्रामाणिक रचना के तौर पर जाना जाता है। इसी तरह से जहांगीर के समय में मुल्ला मसीह ने मसीही रामायन नामक एक मौलिक रामायण की रचना की। पांच हजार छंदों वाली इस रामायण को सन 1888 में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित किया गया।
अवध में वाजिद अली शाह के शासनकाल में भी हिंदी, अवधी और ब्रज भाषाओं का खूब विकास हुआ। मुस्लिम कवियों और रचनाकारों का हिंदी साहित्य में योगदान रफीक शादानी से लेकर आज के कवि फारुख सरल और वाहिद अली वाहिद तक अनवरत जारी है। इसके अलावा लखनऊ के ही मिर्जा हसन नासिर भी हिंदी के रचनाकार रहे हैं।
वर्तमान समय में लखनऊ के हबीबुल हसन, कहानीकार इरशाद राही, कवयित्री दुरफिशा चांदनी, बारबंकी के आचार्य मूसा अशांत, उन्नाव के कहानीकार व कवि नसीर अहमद और अमेठी के रहमतुल्लाह रहमत जैसे मुस्लिम कलमकार हिंदी के लिए अपना अहम योगदान दे रहे हैं।
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए
वाजिद अली शाह
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अवध के बादशाह वाजिद अली शाह के समय में हिंदी-अवधी-ब्रज में अनेकों ठुमरियां, ख्याल, टप्पे और दादरे लिखे गए। खुद वाजिद अली शाह की प्रसिद्ध ठुमरी बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए, आज भी बेहद लोकप्रिय है। वाजिद अली शाह खुद भी संगीत और साहित्य के प्रेमी थे, इसलिए उनके दरबार में हिंदी-अवधी-ब्रज भाषा के रचनाकारों को बहुत अहमियत दी जाती थी।
हिंदी मंचों पर छाए रहे रफीक शादानी
रफीक शादानी
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बर्मा में 1934 में जन्मे रफीक शादानी वहां दूसरे विश्व युद्ध के बाद इत्र कारोबार बर्बाद हो जाने के बाद फैजाबाद (अब अयोध्या) में आकर बस गए थे। उनकी मृत्यु 9 फरवरी 2010 में हुई। अवधी और हिंदी भाषा के प्रसिद्ध रचनाकार थे। कुपंथी औलाद, आतंकवाद, हेलमेट, ओफ-फोह, मोबाइल के चाकर में, न वो ज्ञानी न वो ध्यानी, जिऔ बहादुर खद्दारधारी जैसी रचनाएं बहुत मशहूर हुईं। खास बात ये है कि वे निरक्षर थे।
मध्यकालीन युग के कवियों में मलिक मोहम्मद जायसी बड़ा नाम
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मलिक मोहम्मद जायसी (1467-1542) उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले केजायस केरहने वाले थे। हिंदी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्री धारा के कवि थे। पद्मावत, अखरावट, चित्ररेखा, कान्हावत, कहरनामा समेत 21 प्रमुख रचनाएं हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मध्यकालीन कवियों की गिनती में जायसी को प्रमुख कवि का स्थान दिया गया है। पद्मावत दोहा और चौपाई, छंद में लिखा गया महाकाव्य है।
हिंदी फिल्मों में छाया नौशाद के संगीत का जादू
नौशाद
25 दिसंबर 1919 में लखनऊ में जन्मे नौशाद ने अपने संगीत से हिंदी फिल्मों को एक से बढ़कर एक गीतों का उपहार दिया है। खासकर हिंदी फिल्मों में उनके संगीतबद्ध भजनों ने लोकप्रियता का आकाश छुआ जो आज भी घर-घर में सुने और गाए जाते हैं। संगीतकार के साथ वे अच्छे शायर व कवि भी थे। उनकी कृति ‘आठवां सुर’ में इसकी बानगी भी मिलती है।
हिंदी मंचों के लिए अहम हैं फारूक़ सरल
फारूक सरल
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सीतापुर में जन्मे फारूक़ सरल इस वक्त हिंदी काव्य मंचों पर अपनी अलग पहचान रखते हैं। उनकी हिंदी और अवधी की रचनाओं को श्रोता दिल थामकर सुनते और सराहते हैं। सेवानिवृत्त शिक्षक फारुक का अवधी भाषा में लोकगीतों का संकलन ‘भोले भाले गीत हमारे’ प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन और अन्य टीवी चैनलों पर उनका काव्य पाठ समय-समय पर प्रसारित होता रहता है।
मशहूर गीतकार व पटकथा लेखक जावेद अख्तर का अवध से रिश्ता
जावेद अख्तर
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हिंदी फिल्मों के मशहूर पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने भी अपने हिंदी गीतों व कहानियों से बड़ा मुकाम हासिल किया। उनके दादा सीतापुर के खैराबाद के रहने वाले थे जो मशहूर शायर मुज्तर खैराबादी के रूप में याद किए जाते हैं। जावेद के पिता जां निसार अख्तर की गिनती भी प्रगतिशील कवियों में होती है। वे मशहूर शायर मजाज के भांजे भी हैं। यूं तो जावेद अख्तर का जन्म ग्वालियर का है लेकिन उनका काफी समय बचपन में लखनऊ में बीता।
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं वाहिद अली वाहिद
वाहिद अली वाहिद
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लखनऊ के वर्तमान हिंदी कवियों में वाहिद अली वाहिद का प्रमुख स्थान है। उनकी रचनाओं में सांप्रदायिक सौहार्द और देशभक्ति का ऐसा रंग देखने को मिलता है जो अवध की गंगा-जमुनी सभ्यता से मिलकर बना है। वाहिद अली को हिंदी संस्थान समेत कई बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं। वाहिद अली की कविता ‘द्वन्द कहां तक पाला जाए, युद्ध कहां तक टाला जाए, दोनों ओर लिखा हो भारत, सिक्का वही उछाला जाए।
तू भी है राणा का वंशज, फेंक जहां तक भाला जाए’ में जहां देशप्रेम देखने को मिलता है तो वहीं उनकी रचना ‘ जेठ की धूप से चैन मिले, बरसे जो मोहब्बत की बदरी, बदरी बरसे जब राम गली, खुश हो के चले रमजान अली।’ जैसी रचनाओं में सांप्रदायिक सौहार्द की झलक दिखाई देती है। वाहिद अली बताते हैं कि उनकी अब तक 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से वाहिद के राम और मौला अली बजरंग बली समेत नौ पुस्तकें हिंदी की हैं जबकि तीन गजल संग्रह हैं।.
आप भी लें हिस्सा
प्रतीकात्मक तस्वीर
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अगर आपने अभी तक ‘हिंदी हैं हम’ अभियान में हिस्सा नहीं लिया है तो देर न कीजिए। इस अभियान में हर आयुवर्ग के लिए जगह है। छह हफ्ते तक चलने वाले इस अभियान में अभी पांच हफ्ते और बचे हैं। कहीं पुरस्कार और पुस्तकें जीतने का बेहतरीन मौका हाथ से निकल न जाए। आपको बस 30 सेकंड का वीडियो रिकॉर्ड करके हमें भेजना है। इसमें खुद भी हिस्सा बनें और अपने दोस्तों-परिचितों व पूरे परिवार को सहभागी बनने को प्रेरित करें।
कैसे बनें अभियान का हिस्सा
- बच्चे : रोज अमर उजाला पढ़ें। जो खबर या लेख पसंद हो, उसे पढ़ें व वीडियो बनाएं।
- माता-पिता : हिंदी साहित्य की किसी प्रिय रचनाकार की रचना का अंश पढ़ें। यह कहानी, कविता या निबंध कुछ भी हो सकता है।
- युवा : नए समय के नए अनुभव और नए जमाने की अपनी पसंद की बात करें या किसी भी प्रिय रचना का अंश पढ़ें।
- दादी-नानी : बच्चों को किस्से सुनाएं, लोकगीत या गुजरे दिन की बातें, जिनसे आनंद भी आए और सीख भी मिले।
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