फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘राष्ट्रगान से ज्यादा जरूरी है कर्त्तव्य निभाना’ : हाईकोर्ट

Tue, 07 Feb 2017 12:38 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
विज्ञापन
डेमो - फोटो : amar ujala
विज्ञापन
हाईकोर्ट और जिला अदालतों में रोजाना न्यायिक कार्य शुरू होने से पहले राष्ट्रगान अनिवार्य करने के लिए दाखिल याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने खारिज कर दी।
विज्ञापन


जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही और जस्टिस संजय हरकौली ने अपने निर्णय में कहा कि उनकी नजर में अपना कर्तव्य निभाना ज्यादा जरूरी है। राष्ट्रगान का सम्मान उसमें और संविधान के सच्चे मूल्यों में विश्वास रखने से है।

अदालतों में रोजाना राष्ट्रगान गाना अपने आप में संविधान के प्रति सम्मान दर्शाने का तरीका शायद नहीं कहा जा सकता।अधिवक्ता सुरेश कुमार गुप्ता ने याचिका दायर की थी।
विज्ञापन


उनका कहना था कि हाईकोर्ट, जिला अदालतों, ट्रिब्युनलों और अन्य न्यायिक संस्थानों में राष्ट्रगान का गायन करवाना नैतिक और संवैधानिक दायित्व है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से पिछले वर्ष नवंबर में श्याम नारायण चौकसे मामले में सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान अनिवार्य करने के निर्णय से प्रभावित याची का कहना था कि अदालतों में भी हर सुबह खड़े होकर राष्ट्रगान गाया जाना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि समय आ चुका है कि नागरिक यह पहचाने कि वे राष्ट्रगान के लिए सम्मान प्रदर्शित करने के कर्तव्य से बंधे हैं। यह संवैधानिक रूप से देशभक्ति की पहचान है।
Trending Videos

धार्मिक प्रार्थना नहीं है राष्ट्रगान

डेमो
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51-ए मूल कर्तव्यों में कहा गया है कि ‘हर भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान से बंधा रहेगा और इसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करेगा।

’ इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाने और लोगों को इसके लिए खड़े होने के आदेश दिए थे। अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों में रूटीन के तौर पर राष्ट्रगान गाने की कोई परंपरा नहीं रही है।

सिनेमा हॉल को लेकर दिए आदेश में भी इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। न्यायिक स्वायत्तता रखने वाले हाईकोर्ट ने भी ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है, न ही देश में ऐसा कहीं हो रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक प्रार्थना और राष्ट्रगान गाने में फर्क है। ईश्वर की प्रार्थना खुद का बनाया अनुशासन है जो व्यक्ति आध्यात्मिक लाभ के लिए करता है। यह निजी है, धार्मिक है। वहीं, राष्ट्रगान गाने की प्रार्थना से तुलना नहीं की जा सकती।

देशभक्ति पैदा करने या कर्तव्य भाव जगाने के लिए सार्वजनिक संस्थान के अधिकारियों को इसे जबरन गाने के लिए नहीं कहा जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि कर्तव्य का निर्वहन सर्वोपरि है और यही असली पूजा है।
विज्ञापन

बताए कर्तव्य और देशभक्ति के मायने

डेमो
कर्तव्य : हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि कर्तव्य वह है जिसका निर्वहन हर व्यक्ति को करना है, वह नहीं जिसे करवाने के बारे में लोग सोचें। यह निर्वहन कष्ट भरा और अनिवार्य हो सकता है लेकिन इसे ठीक से किया जाना चाहिए।

नागरिक अपने सार्वजनिक या निजी जीवन में इस निर्वहन से स्वतंत्र नहीं हो सकते। नागरिक को अपने कर्तव्य याद रहें और वह उनका निर्वहन करे तो यह उसके लिए सम्मान की बात होती है। देश के नागरिक होने के नाते यह हम पर कर्ज है।

देशभक्ति : हाईकोर्ट ने देशभक्ति पर कहा कि यह सामूहिक दायित्वों की जीवंत समझ है। इसकी जड़ें देश में होती हैं और इसे किसी धर्म के रूप में नहीं सोचा जा सकता। सच्ची देशभक्ति किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हो सकती।

यह केवल अपने देश के प्रति प्रेम पैदा करती है और जो देश के हैं, उनके प्रति सम्मान करना सिखाती है। देश का होना एक जन्मसिद्ध और अंतर्निहित भाव है, जबरदस्ती का नहीं। आप देश के हैं, यह प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाली भावना है। शेक्सपीयर अपने नाटक ‘को‌र‌िययिलेनस’ में देश के प्रत‌ि सम्मान को जीवन से बढ़कर मानते हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें