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कुलपति की अनदेखी पर कोर्ट सख्त, सरकार का फैसला निरस्त

Fri, 25 Nov 2016 02:41 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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बुंदेलखंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (बीआईईटी) झांसी में चहेते के चयन के लिए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कुलपति की अनदेखी को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है।
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कोर्ट ने कुलपति की जगह शिक्षाविद् को प्रोफेसरों की चयन समिति का मुखिया बनाए जाने के सरकार के आदेश को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने माना कि ऐसा छिपे हुए मकसद के लए किया गया था।

रोचक तथ्य यह है कि इसी समिति को इंस्टीट्यूट के निर्देशक के भाई के चयन का भी फैसला करना था। सरकार ने चार हफ्ते में जवाबी हलफनामा पेश करने को कहा है।

जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान और जस्टिस वीरेंद्र कुमार (‌द्वितीय) ने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रदेश सरकार ने छिपे हुए मकसद के लिए चयन समिति का अध्यक्ष बनाने में वीसी की अनदेखी की।
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...यह वजह जिसके कारण वीसी थे चयन समिति से बाहर

प्रो. आरसी यादव संस्‍थान के पूर्व निदेशक थे। उन्हें चयन समिति का अध्यक्ष बनाया गया। संस्‍थान के निदेशक डॉ. दिवाकर यादव समिति के उपाध्यक्ष हैं और समिति को उनके भाई विक्रम यादव के चयन का निर्णय करना है। यह एक वजह हो सकती है कि वीसी को इस चयन समिति से बाहर रखा गया।

अपनी तरह के इस रोचक मामले में एकेटीयू सरकार के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंची थी। याचिका में प्रो. आरसी यादव को चयन समिति का अध्यक्ष बनाने के प्रदेश सरकार के 7 नवंबर 2016 के निर्णय को चुनौती दी गई थी। इसमें कहा गया था कि संस्‍थान के नियम 4-ए (1) के तहत प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए चयन समिति बनाई जाती है।

वीसी न हो, तभी सरकार कर सकती है नियुक्ति
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रदेश सरकार चयन समिति अध्यक्ष पद पर शिक्षाविद की नियुक्ति तभी कर सकती है जब वीसी उपलब्ध न हों। यह भी देखने की जरूरत है कि प्रदेश सरकार के निर्णय के पीछे कोई छिपा हुआ उद्देश्य तो नहीं है?
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