'हमारे संविधान में दी गई कानून-व्यवस्था के तहत लोगों (नागरिकों) को समाज की शांति को ‘डिस्टर्ब’ किए बगैर धार्मिक आस्था के निर्वहन की इजाजत दी जानी चाहिए।'
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम संवैधानिक व्यवस्था वाली यह टिप्पणी दुर्गा पूजा सुचारु व शांतिपूर्ण न किए जाने की आशंका जताने वाले एक मामले में की है।
न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अशोक पाल सिंह की खंडपीठ ने दूरगामी महत्व का यह फैसला बलरामपुर जिले की मां दुर्गा पूजा अनुष्ठान समिति के समन्वयक सुनील तिवारी की रिट का निपटारा कर सुनाया।
याची की तरफ से अधिवक्ता हरिशंकर जैन व रंजना अग्निहोत्री ने अदालत से आग्रह किया कि बलरामपुर जिले में दुर्गा पूजा पंडालों में सरकारी अमले को दखल न देने दिया जाए।
राज्य सरकार को निर्देश दिए जाएं कि पूजा स्थल पर सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की जाए, जिससे नवरात्र में दुर्गापूजा शांतिपूर्वक संपन्न हो सके। उधर, राज्य सरकार की तरफ से मुख्य स्थायी अधिवक्ता आईपी सिंह पेश हुए।
पक्षकारों के वकीलों ने पिछले साल 12 अक्टूबर को सुनाए गए कोर्ट के फैसले की तरफ अदालत का ध्यान आकृष्ट कराया। इसमें अदालत ने दुर्गापूजा संबंधी अहम निर्देश दिए थे।
इनमें नवरात्र के दौरान परंपरागत व नए स्थानों पर जहां दुर्गाजी व अन्य मूर्तियां स्थापित की जाएं, वहां जिले के अफसर कानून-व्यवस्था बहाल रखना सुनिश्चित करेंगे।
अदालत ने कहा था कि ऐसी जिन जगहों को लेकर दीवानी व फौजदारी विवाद हो, वहां के लिए स्थानीय प्रशासन दुर्गापूजा की अनुमति नहीं देगा।
कोर्ट ने यह भी सख्त ताकीद की थी कि इस आदेश को मूर्तियों की स्थापना होने से पहले से लागू किया जाए व इसका सख्ती से पालन किया जाए।
कोर्ट ने दुर्गापूजा व प्रतिमा विसर्जन को शांतिपूर्ण संपन्न कराने के लिए संबंधित जिले के डीएम व एसपी की निजी जिम्मेदारी करार दिया था।
इसकी अवहेलना पर कोर्ट ने कहा था कि इन अफसरों के खिलाफ इस आदेश की अवमानना समेत अन्य कार्रवाई की जाएगी।
अदालत ने कहा कि कोर्ट के पहले के फैसले में दिए गए ये निर्देश याची के आग्रह को पूरा करने वाले लगते हैं।
ऐसे में इस याचिका का पक्षकारों के अधिवक्ताओं की सहमति से निपटारा कर दिया और 12 अक्टूबर 2012 के फैसले के तहत कानून व्यवस्था बहाल रखने के निर्देश दिए।
इसके बावजूद याची समिति की तरफ से यह आशंका जताई गई कि दुर्गापूजा शांतिपूर्वक व सुचारुरूप से संपन्न नहीं हो सकती है।
इस पर अदालत ने कहा कि जनता के दिमाग में यह आशंका लोकशाही के लिए अच्छा संकेत नहीं लगती है।
संवैधानिक रूप से बरकरार कानून व्यवस्था में नागरिकों को समाज की शांति को डिस्टर्ब किए बगैर धार्मिक आस्था का निर्वहन करने की अनुमति दी जानी चाहिए।