हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण व कल्याण कानून के तहत माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के साथ संतानों व अन्य प्रभावित पक्ष को भी उसी प्रावधान के तहत अपील दायर करने का हक है।
कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2007 के अधिनियम के तहत अधिनियम की धारा-5 के तहत एसडीएम के पारित आदेश के खिलाफ न केवल माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक जिलाधिकारी के सामने धारा-16 के तहत अपील दाखिल कर सकते हैं, बल्कि संतानों व अन्य किसी प्रभावित पक्ष को भी उसी के तहत अपील दायर करने का अधिकार है। इस अहम विधि व्यवस्था के साथ कोर्ट ने जिलाधिकारी लखनऊ के इसी आधार पर पारित आदेश कि वह संतानों व रिश्तेदारों की अपील को नहीं सुन सकते हैं, को खारिज कर दिया। और याचिकाकर्ताओं को वापस जिलाधिकारी के समक्ष अपील दाखिल करने की अनुमति दी। साथ ही कोर्ट ने अपील पर जिलाधिकारी को चार माह के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह ने यह फैसला व आदेश रूपम उर्फ ज्योति शर्मा और उसके पति की ओर से दाखिल याचिका पर दिया। इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने अपीलीय प्राधिकारी के अध्यक्ष जिजला मजिस्ट्रेट लखनऊ के पारित उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें यूपी भरण-पोषण एवं कल्याण माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत उनकी अपील को विचारणीयता के आधार पर खारिज कर दिया गया था।
कोर्ट ने अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अधिनियम की धारा 16 में अपील के अधिकार का जिक्र करते हुए यह अधिकार संतानों व अन्य प्रभावित पक्ष को देने की बात शामिल करना छूट गया है। यह केवल आकस्मिक चूक कही जा सकती है। कहा कि ऐसे में कोर्ट को किसी कानून की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या करनी होती है। किसी विधायन की यह मंशा नहीं हो सकती है कि यदि किसी आदेश से प्रभावित दो पक्ष हैं, तो एक को अपील का अधिकार दिया जाए और दूसरे को इससे वंचित रखा जाए।
अपील में हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा यह था...
क्या किसी भी विधायिका की ऐसी मंशा हो सकती है कि वह किसी पीड़ित व्यक्तिको उपचारहीन (बिना राहत दिए) छोड़ दे, जो पूरी तरह से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के खिलाफ है।
शब्दावली त्रुटिपूर्ण हो तो न्यायालय की भूमिका अहम हो जाती है
अदालत ने फैसले में कहा- यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि न्यायाधीश, विधायिका के बनाए किसी कानूनी प्रावधान के शब्दों में बदलाव नहीं कर सकते। पर, दूसरा पहलू यह भी है कि यदि कानून के शब्दों में ‘आकस्मिक चूक’ के कारण त्रुटिपूर्ण है तो न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
यह था मामला
याची ज्योति और उसके पति के खिलाफ उसके ससुर ने एसडीएम सदर लखनऊ की अदालत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 की धारा 5 के तहत एक मुकदमा दाखिल किया कि बेटे-बहू उन्हें परेशान करते हैं। उनके घर से याचीगण, जो कि उनका बेटा व बहू हैं, को बाहर निकाल दिया जाए। इससे पहले बहू ने उनके खिलाफ प्रताड़ना के बाबत प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिस पर बाद में इस बात पर समझौता हो गया था कि वे अपने बेटे-बहू को मकान में रहने देंगे।
याची के वकील के अनुसार दहेज की मांग और यहां तक कि खाने और रहने के लिए भी उसे लगातार प्रताड़ित किया जाता था, जिसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और याचिकाकर्ता को घर के भूतल पर रहने दिया गया। एसडीएम ने 6 जून 2019 को ससुर की अर्जी मंजूर करते हुए बेटे व बहू को घर खाली करने का आदेश जारी कर दिया। जिसके खिलाफ बहू रूपम उर्फ ज्योति शर्मा ने डीएम के यहां अपील दाखिल की जिसे पोषणीयता के अभाव में खारिज कर दिया गया। इसी आदेश के खिलाफ बहू व बेटे ने हाई कोर्ट की शरण ली थी।