तुम आए हो न शब-ए-इंतजार गुजरी है, तलाश में है सहर बार-बार गुजरी है। मशहूर शायर फैज अहमद फैज की यह गजल अपनी खूबसूरत आवाज में सुनाकर गायिका मालविका हरिओम ने महफिल में जान डाल दी।
मंगलवार को मौका था गालिब इंस्टीट्यूट की ओर से लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित नेशनल सेमिनार ‘लखनऊ इन द एज ऑफ गालिब’ का। कार्यक्रम के पहले दिन गजल गायिका मालविका हरिओम ने शाम-ए-गजल में मिर्जा गालिब, फैज अहमद फैज, कैफी आजमी व साहिर लुधियानवी की खूबसूरत गजलें पेश कीं। उन्होंने शाम-ए-गजल में सबसे पहले मिर्जा गालिब की ‘दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ व ‘दिल-ए-नादां’ गजल पेश कर महफिल को रूमानी बना दिया। इसके बाद उन्होंने फैज अहमद फैज की ‘हम कि ठहरे अजनबी’ व ‘तुम आए हो न शब-ए-इंतजार’ गजल को अपनी आवाज देकर दर्शकों का दिल जीत लिया। उन्होंने कैफी आजमी की गजल ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे’ सुनाई। शाम-ए-गजल में उन्होंने ‘मत किसी से मुआमला कीजिए’, ‘आवाज दे कहां है’, ‘कागज पे कलम तेरा’ और ‘गजल मेडली’ भी प्रस्तुत कीं।
गालिब पर दो दिवसीय सेमिनार का आगाज
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग की ओर से गालिब इंस्टीट्यूट, दिल्ली के सहयोग से गालिब पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन मालवीय हॉल में किया गया। लविवि के कुलपति प्रो. एसपी सिंह व अन्य ने इसका उद्घाटन किया। गालिब इंस्टीट्यूट के राजा हैदर ने विद्यार्थियों को गालिब के बारे में अवगत कराया। विभागाध्यक्ष डॉ. अब्बास रजा नैयर ने अतिथियों का स्वागत किया।