आयोग की जांच रिपोर्ट आठ बिंदुओं पर आधारित है। इसके मुताबिक गुमनामी बाबा बंगाली थे और बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी भाषा जानते थे। वह असाधारण मेधावी थे। उन्हें युद्ध, राजनीति व समसामयिकी की गहन जानकारी थी। नेताजी के समान ही उनके स्वर में प्राधिकार का भाव था। उनमें प्रचंड आत्मबल व संयम था, जिसने उन्हें जीवन के अंतिम 10 साल अयोध्या व फैजाबाद में परदे के पीछे रहने के योग्य बनाया था।
परदे के पीछे से बात करने वाले भी उनसे सम्मोहित हो जाते थे। वह पूजा व ध्यान में पर्याप्त समय व्यतीत करते थे। भारत में शासन की स्थिति से उनका मोहभंग था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह बड़ी लज्जा की बात है कि उनका अंतिम संस्कार इस प्रकार किया गया कि उसमें मात्र 13 व्यक्ति ही शामिल हो सके थे।
मृत्यु के दो दिन बाद हुआ था अंतिम संस्कार
गुमनामी बाबा की मौत के दो दिन बाद 18 सितंबर 1985 को उनके शव का अयोध्या के गुप्तार घाट पर अंतिम संस्कार किया गया था। मगर उनके पार्थिव शरीर को देखने की इजाजत लोगों को नहीं दी गई थी। जिन्होंने आयोग को यह बयान दिया है, उनके मुताबिक मृत्यु के बाद बाबा का चेहरा विकृत हो गया था।
वर्ष 1945 में नेताजी की रहस्यमय मौत हो गई थी। इसकी जांच के लिए वर्ष 1999 में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया गया।
आयोग ने सात साल की जांच बाद 6 मई 2006 को रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें बताया गया था कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। जिसे भारत सरकार ने अस्वीकार कर दिया था।