हरचंदपुर के पास अचलेश्वर कस्बे में मिला किसान बालकिशुन यादव कहता है कि ‘हियां तौ कांग्रेस का माहौल है, पर पहले जैसी बात नाय है।
कारण, महंगाई, सड़क, बिजुली से सबै परेशान हैं। प्रियंका हुन ते कौनों फर्क नाय पड़े वाला है। जेहिका जहां वोट देक हैं, पहिले ही तय कै लीन है।
किसान आगे बोला, 'मुलौ मोदी के नाम कै चरचा खेत, खरिहान, बाजार सबै जगह है। कौनों बड़ा नेता सामने होत तो सोनिया से लड़ाई होत।’
राही ब्लाक के मधपुरी गांव में परचून की दूकान के सामने बेंच पर बैठे पूर्व ग्राम प्रधान रमाशंकर पाण्डेय चुनावी माहौल के बारे में पूछने पर पहले अपनी शख्यिसत साफ कर देना चाहते हैं।
हिट हो गया नारा, अबकी बार...
रमाशंकर पाण्डेय कहते हैं, न तो वे कांग्रेस के चवन्निया मेंबर हैं और न ही पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट दिया था। पर इस बार....।
बात आगे बढ़ाते हैं, एम्स मेरे ही गांवसभा की 80 फीसदी जमीन पर बन रहा है। इलाके का कायाकल्प हो गया है।
जमीन के भाव 6 महीने में 8 गुना बढ़ गए हैं और छोटे से गांव में बड़ा बाजार विकसित हो रहा है। किसका फायदा होगा? लोग इधर-उधर की तब सोचते जब सामने कोई बड़ा चेहरा होता।
हर चौराहे पर मोदी की बयार
जिले का तकरीबन हर चौराहा आजकल बालकिशुन व रमाशंकर जैसों की बातों से गुलजार है। कांग्रेस की लानत-मलामत के साथ सोनिया के प्रति थोड़ी सी सहानुभूति।
विरोधी दलों के लोगों के बीच कहीं-कहीं पर सोनिया के सामने बड़ा चेहरा न होने का मलाल भी झलकता है। नरेंद्र मोदी के नाम का जिक्र हर जगह है, कहीं उम्मीदों, कहीं नकार के साथ।
लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीत चुकीं सोनिया चौथी बार भी रायबरेली से जज्बाती रिश्तों और विकास की मेगा परियोजनाओं के सहारे रण जीत लेने की कोशिश में हैं।
पर पानी-बिजली, सड़क सरीखी बुनियादी समस्याओं से हलकान रायबरेली का आम मतदाता मेगा परियोजनाओं के नाम पर हुलसता नहीं दिखता।
प्रियंका का कौशल कसौटी पर
ऐसा नहीं कि कांग्रेस के प्रति पनपते गुस्से को 10, जनपथ की भनक नहीं। फिलहाल गुस्से को थामने का जिम्मा प्रियंका के हवाले है।
पिछले 10 दिनों में वे करीब 50 से अधिक छोटी-बड़ी सभाएं कर मां सोनिया का जलजला बरकरार रखने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं।
कहीं मोदी के खिलाफ तेवरदार भाषण देती हैं तो जज्बात उभारने के लिए महिलाओं और बच्चों के बीच जाकर गांव-घर का हालचाल भी पूछने लगती हैं।
खास बात यह है कि हर बार से अलग प्रियंका अपने भाषणों में रायबरेली के सवालों तक सीमित नहीं रहतीं।
सब पर हमला बोल रही हैं प्रियंका
प्रियंका गांधी भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी, परिवार पर हमलों और गांधी विरोधी और गांधी की विचारधारा पर भी टिप्पणियां कर रही हैं।
पर कांग्रेस के प्रति सहानुभूति रखने वाले खीरों के इश्तियाक कहते हैं कि मोदी फैक्टर और छोटे मोटे सवालों पर स्थानीय लोगों की नाराजगी के बीच सोनिया की जीत का पिछला मार्जिन बरकरार रख पाना बड़ी चुनौती है।
पर इसी बहाने प्रियंका का कौशल कसौटी पर है। देखना है कि उनकी सभाओं का मतदाताओं पर क्या असर पड़ता है।
दलितों में हाथी के साथ हाथ की भी चर्चा
दो बार टिकट बदलने के बाद बसपा ने बाराबंकी के प्रवेश सिंह को करीब छह महीने पहले प्रत्याशी घोषित किया था।
पर अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद वह चुनाव प्रचार को अपेक्षित रफ्तार नहीं पकड़ा पाए। सोनिया के खिलाफ दमदार उम्मीदवार की गैरहाजिरी तमाम बसपाइयों को कांग्रेस के छाते के नीचे खड़ा करती नजर आ रही है।
सोनिया के नामांकन के दो दिन पहले बसपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए रायबरेली जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष सुदर्शन राम कहते हैं कि बसपा ने ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार बना दिया है जो चुनाव के प्रति तनिक भी गंभीर नहीं।
ऐसे में कान आंख बंदकर बसपा में कैसे रहता? दलित बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले उत्तरपारा के फल कारोबारी रामकुमार और राही ब्लाक के खागीपुर संडवा के रामभरोसे कहते हैं, उनकी बस्ती में हाथी के साथ-साथ हाथ की भी चर्चा है।
जी जान से भाजपा ही जुटी
यूं तो जो भी मैदान में हैं, सब सोनिया को ही चुनौती दे रहे हैं। पर अपनों का अपेक्षित सहयोग न मिलने के बावजूद भाजपा प्रत्याशी अजय अग्रवाल ही जूझते नजर आ रहे हैं।
गांव-गांव खाक छान रहे हैं। पर टिकट के स्थानीय दावेदारों के समर्थकों की बयानबाजी से माहौल थोड़ा असहज हुआ था। पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के पूर्व सदस्य रामशंकर वर्मा कहते हैं कि, अजय अग्रवाल को प्रत्याशी बनाने का पहले उन्होंने भी विरोध किया था, नेतृत्व से टिकट बदलने की गुहार भी।
कहते हैं, अब अनुशासित सिपाही होने के नाते उनके साथ पूरी ताकत से जुट गया हूं। मोदी फैक्टर के चलते कोई अप्रत्याशित नतीजा आ जाए, तो किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए।
भाजपा के डर से ही प्रियंका मैदान में
रमाशंकर बताते हैं कि भाजपा की जीत का डर न होता तो प्रियंका को मां के लिए गांव-गांव न घूमना पड़ता।
वहीं खीरों के स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता भोलेंद्र सिंह बताते हैं कि मैं कुछ उन गांवों में भी गया हूं जहां विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन वोट मिले थे।
अब उसी गांव में तीन सौ मिल जाये तो कोई हैरत नहीं। कहते हैं, अब तक अजय अग्रवाल ने जितने गांवों का दौरा किया, किसी प्रत्याशी ने नहीं किया।
हर जगह की तरह मोदी फैक्टर को यहां भी बेहतर रिस्पांस मिल रहा है, नतीजे चौंकाने वाले भी हो सकते हैं।
सपा और नोटा का असर
पिछले विधानसभा चुनाव में क्षेत्र की पांच में से चार सीटें झटकने वाली सपा मैदान से गैरहाजिर है। पहले अपने लोगों से नोटा को प्राथमिकता देने की अपील की थी।
पर वोटिंग से ऐन पहले अपील स्थगित कर दी। सपा विधायक रामलाल अकेला कहते हैं कि चूंकि विधानसभा का चुनाव हमें कांग्रेस के खिलाफ ही लड़ना है, इसलिए अभी कांग्रेस को समर्थन देने से भविष्य में कुछ दिक्कतें होतीं।
इसलिए विकल्प के तौर पर नोटा को प्राथमिकता देने की बात कही गयी थी। मुलायम सिंह के निर्देश पर सांप्रदायिक ताकतों को शिकस्त देने के मकसद से अपील स्थगित कर दी गई है।
पर जिंदगी भर लाल झंडा उठाने वाले फिरोज गांधी डिग्री कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामबहादुर वर्मा कहते हैं कि नोटा का शोशा दबाव बनाने के लिए उछाला गया था।
चुनौती या चेहरा चमकाने की कवायद
तृणमूल कांग्रेस की प्रत्याशी अंजू सिंह हों या आम आदमी पार्टी की अर्चना श्रीवास्तव, इनकी चर्चा दूरदराज के गांवों तक नहीं पहुंची।
इन दोनों के पास न बूथ स्तर का संगठन है न अन्य प्रत्याशियों जैसे संसाधन। पर क्षमता के अनुरूप मेहनत कर रही हैं। अर्चना के साथ लगा ‘आप’ का एक वालंटियर कहता है कि अर्चना जुझारू हैं, ईमानदार भी, पर उनकी सीमाएं भी हैं।
अगर कुमार विश्वास की तरह यहां भी कोई चर्चित चेहरा तीन-चार महीने पहले आ गया होता तो हम भी अपना जौहर दिखाते। पर सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश सिंह राना कहते हैं कि विरोधी दलों में सोनिया से लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं दिखती। यहां इंदिरा गांधी भी चुनाव हार चुकी हैं।
जिन लोगों का कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं, इलाके से वाकिफ नहीं, उनका सोनिया सरीखी शख्सियत के मुकाबले अचानक चुनाव मैदान में उतरना यही बताता है कि उनका एजेंडा कांग्रेस को चुनौती देना कम अपना चेहरा चमकाना ज्यादा है।
कौन दे रहा है सोनिया को चुनौती
अजय अग्रवाल (भाजपा)
सुप्रीम कोर्ट में वकील। पांच महीने से क्षेत्र में डेरा डाले हैं। मोदी राग जपते हुए गांव-गांव जा रहे हैं। स्थानीय भाजपाइयों का अपेक्षित सहयोग नहीं, पर मोदी फैक्टर का लाभ मिल रहा है।
प्रवेश सिंह (बसपा)
बाराबंकी के पूर्व ब्लॉक प्रमुख। प्रवेश के पहले दो प्रत्याशी बदले गए। छह महीने से सक्रिय पर प्रचार को अपेक्षित रफ्तार नहीं पकड़ा पाए। बसपा के काडर व सजातीय वोटरों से ज्यादा उम्मीदें।
अर्चना श्रीवास्तव (आम आदमी पार्टी)
स्थानीय वकील और ‘आप’ की जिला संयोजक हैं। जस्टिस फखरुद्दीन के चुनाव लड़ने से इन्कार के बाद अर्चना को मैदान में उतारा गया। वकीलों व सजातीय वोटरों पर ज्यादा भरोसा।
अंजू सिंह (तृणमूल कांग्रेस)
18 फरवरी को शादी हुई, 22 मार्च को टिकट मिला। नई नवेली तबसे ही सियासत में किस्मत आजमाने को हाथ-पैर मार रही हैं। रायबरेली की बहू और बेटी दोनों बताकर वोट मांग रही हैं।