फूलपुर संसदीय क्षेत्र की चर्चा हो, तो पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जिक्र होना लाजिमी है।
कांग्रेसी तो यहां तक कहते हैं कि नेहरू के बिना फूलपुर की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
यही वजह है कि हर चुनाव से पहले कांग्रेसियों को अपनी पुश्तैनी सीट याद आ जाती है। विधानसभा चुनाव-2012 में राहुल गांधी ने यूपी में चुनाव अभियान का आगाज यहीं से किया।
इस सीट से पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह का भी नाता रहा। इस सबके बावजूद संसदीय क्षेत्र के नौजवान बेरोजगार हैं, मेहनत किसान करते हैं और कमाई दलाल।
इस लोकसभा सीट में शामिल शहरी क्षेत्रों को छोड़ दें तो ग्रामीण इलाकों में सड़क, पानी, बिजली जैसी मूलभत सुविधाओं के लिए भी लोग तरस रहे हैं।
कागजों पर विकास, किसान बदहाल
फूलपुर से सटे इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र में तीन बड़े पावर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली लेकिन फूलपुर के खाते में कौड़ी भी नहीं आई।
क्षेत्र में आलू, टमाटर जैसी नगदी फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।
यहां लंबे समय से प्रोसेसिंग यूनिट लगाए जाने की मांग की जा रही है लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। किसानों को मजबूरी में अपनी उपज औने-पौने दाम पर दलालों के हाथों बेचनी पड़ रही है।
कागजों में भले ही फूलपुर इंडस्ट्रियल एरिया डवलप कर लिया गया हो लेकिन इफ्को को छोड़कर औद्योगिक विकास के नाम पर क्षेत्र में ऐसा कोई बड़ा उद्योग स्थापित नहीं किया गया, जहां 100 लोगों को भी रोजगार मिला हो।
बकुलाही नदी भी इलाके के किसानों के लिए अभिशाप बनी हुई है। पूरी नदी सिल्ट से पट गई है। हर साल बाढ़ में किसानों की करोड़ों रुपये की फसल बर्बाद हो जाती है।
जिसको दिया मौका, उसी ने दिया धोखा
फूलपुर के मतदाताओं ने भाजपा छोड़ हर पार्टी को मौका दिया लेकिन कोई भी उनके भरोसे पर खरा नहीं उतरा।
आजादी के बाद लगातार 37 साल तक लोगों ने कांग्रेस से विकास की उम्मीद की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
यही वजह रही कि 1984 के बाद कांग्रेस इस सीट पर कभी कब्जा नहीं कर सकी। 1989 और 1991 के चुनाव में फूलपुर सीट पर जनता दल का कब्जा रहा।
1996 व 98 में सपा से जंग बहादुर पटेल तो 99 में धर्मराज सिंह पटेल तो 2004 में सपा से ही अतीक अहमद इस सीट से जीते।
2009 के चुनाव में पहली बार बसपा पर जनता ने भरोसा जताया और इस सीट से कपिल मुनि करवरिया ने जीत हासिल की, लेकिन उनके वादे भी अधूरे रह गए।
पार्टियों के सामने बड़ी चुनौती
सपा हो या बसपा, दोनों के शासनकाल में फूलपुर को कुछ खास नहीं मिला जबकि दोनों को ही फूलपुर की जनता मौका दे चुकी है।
लिहाजा दोनों के प्रत्याशियों के सामने चुनाव में बड़ी चुनौती है। कांग्रेस ने पूर्व क्रिकेटर मो. कैफ को मौका दिया है।
कैफ को फिलहाल सपा के वोटबैंक में बड़ी सेंध मारने वाले के तौर पर देखा जा रहा है।
इस चुनाव से पहले फूलपुर में सबसे कमजोर भाजपा ही रही और इस सीट पर कभी भी कब्जा नहीं कर सकी। इस बार केशव प्रसाद मौर्य के सामने कमल खिलाने की चुनौती है।
...और माननीय देते रहे ये दलील
सांसद कपिल मुनि करवरिया का कहना है कि राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के तहत 531 गांवों में विद्युतीकरण कराया गया।
150 गांवों में सांसद निधि से विद्युतीकरण कराया। तीन हजार हैंडपंप और 1500 सोलर लाइटें लगवाईं। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए सीजीएच को एंबुलेंस दिलाई।
अन्य दो एंबुलेंस की व्यवस्था भी सांसद निधि से की। जहां तक औद्योगिक विकास का सवाल है तो प्रोसेसिंग यूनिट, ओवरब्रिज के निर्माण के लिए पिछले साल नवंबर में राहुल गांधी से मिलकर मांग की थी लेकिन केंद्र सरकार से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
लोकसभा चुनाव-2009 के परिणाम
कपिल मुनि करवरिया (बसपा)1,67,542
श्यामाचरण गुप्ता (सपा)1,52,964
डॉ. सोनेलाल पटेल (निर्दलीय)76,699
धर्मराज सिंह पटेल (कांग्रेस)67,623
करण सिंह पटेल (भाजपा)44,828