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क्यों नहीं बदली मेरठ की तकदीर?

Sun, 16 Mar 2014 01:03 PM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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मेरठ शिक्षा का हब जरूर बना लेकिन निजीकरण के चलते व्यावसायिक शिक्षा आम लोगों से दूर है। वेस्ट यूपी के इकलौते मेडिकल कॉलेज में ट्रॉमा सेंटर तक नहीं है।
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मेरठ-दिल्ली एक्सप्रेस-वे से लेकर हाईस्पीड ट्रेन जैसी कई योजनाओं के प्रोजेक्ट बने तो जरूर लेकिन कोई धरातल पर उतर नहीं सके।

चार फ्लाईओवर बनने से थोड़ी राहत तो मिली, लेकिन बेतरतीब ट्रैफिक के चलते अब भी शहर रेंगता नजर आता है।

स्पोर्ट्स गुड्स में अंतरराष्ट्रीय पहचान रखने वाला मेरठ म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स, कैंची और हैंडलूम इंडस्ट्री में देश में दशकों से बनी धाक खोता जा रहा है।

शुगर इंडस्ट्री और किसान दोनों ही बदहाली के दौर में हैं। कृषि आधारित उद्योगों की संभावनाओं के बावजूद इस दिशा में प्रयास नहीं हुआ।

कई नामचीन पहुंचे संसद में, पर काम रहा सिफर

मेरठ संसदीय सीट से कई नामचीन लोग चुनकर लोकसभा में पहुंचे लेकिन विकास को लेकर किसी ने भी गंभीरता नहीं दिखाई।

त्रासदी ये है कि अस्सी के दशक से यहां के चुनावों में अंतिम चरण में विकास के मुद्दे गौण हो जाते हैं।

जाति-धर्म का सवाल उभर जाता है। सद्भाव की पैरवी करने वालों की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह घुटकर रह जाती है।

भाजपा ने 2009 में नए चेहरे के रूप में राजेंद्र अग्रवाल को मैदान में उतारा, वह सांसद चुने गए। पार्टी ने उनपर फिर भरोसा जताया है। वे मोदी लहर और अपने विकास कार्यों को भुनाने की कोशिश करेंगे।

ऐसे हो जाता है वोटों का बंटवारा

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की यूपी चैप्टर के उपाध्यक्ष पंकज गुप्ता कहते हैं कि यह मेरठ का दुर्भाग्य है कि वोटों का बंटवारा जाति, धर्म के नाम पर हो जाता है।

मेरठ में कभी योजनाबद्ध विकास का प्रयास नहीं हुआ।

राजेंद्र अग्रवाल ने हम लोगों के साथ कई बार बैठकें कीं, सुझाव लिए, लोकसभा में कुछ मुद्दे उठाए भी लेकिन वे धरातल पर नहीं आ सके।

वे पब्लिक से मिलते-जुलते रहे लेकिन मेरठ को मजबूत प्रतिनिधित्व नहीं दे पाए। एनसीआर में मेरठ उपेक्षित है।

यहां के लोग सिर्फ अपनी खासियत की वजह से आगे हैं। वे बिना सुविधाओं के काम कर रहे हैं। यहां अवसर बहुत हैं लेकिन उनका सदुपयोग करने वाला नुमाइंदा नहीं मिला।

विकास में कहीं नहीं ठहरता मेरठ

फिजीशियन डॉ. तनुराज सिरोही का कहना है कि विकास के प्रति कोई दल गंभीर नहीं है।

एनसीआर के दूसरे शहरों से तुलना करें तो मेरठ कहां ठहरता है? प्रदेश में अलग दलों की सरकार रही और केंद्र में अलग दल की। गेंद एक दूसरे के पाले में सरका दी जाती है।

कानून व्यवस्था बदहाल है लेकिन कोई जवाबदेह नहीं। निजीकरण के चलते वेस्ट यूपी शिक्षा का हब जरूर बना लेकिन सरकारी संस्थाओं की हालत खराब है।

चिकित्सा सुविधाओं में बढोतरी नहीं हुई। जर्जर सड़कें पहले भी थीं, आज भी हैं। इन सारे मामलों में सांसद का काम औसत दर्जे का रहा।

विकास में कसर नहीं छोड़ी

सांसद प्रतिनिधि हर्ष गोयल का कहना है कि विकास को लेकर राजेंद्र अग्रवाल ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

सांसद की कोशिशों से मेरठ से लखनऊ के बीच राज्यरानी एक्सप्रेस चली, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में रेलवे आरक्षण काउंटर खुला।

मेरठ-दिल्ली एक्सप्रेस हाईवे और हाईस्पीड ट्रेन की आवाज उन्होंने उठाई। दोनों प्रोजेक्ट पाइप लाइन में हैं।

मेडिकल कॉलेज में ट्रॉमा सेंटर और अन्य सुविधाओं के लिए उन्होंने 150 करोड़ रुपये मंजूर कराए।

पांच साल दिखाई नहीं दिए सांसद

एडवोकेट इस्लाम मलिक कहते हैं कि राजेंद्र अग्रवाल ने चुनाव के समय वादे तो बहुत किए थे लेकिन पूरा कोई नहीं किया।

मुस्लिमों की बड़ी आबादी के प्रति उनका रवैया नकारात्मक रहा। आधे से ज्यादा मुस्लिम वोटर अपने सांसद की शक्ल नहीं पहचानते।

विकास तो दूर, मुस्लिम क्षेत्रों में वह गए तक नहीं। चुनावी मुद्दों की बातें तो सिर्फ भाषणों में सुनाई देती हैं।

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, जाति-धर्म का ध्रुवीकरण शुरू हो जाएगा। मतदान मुद्दों पर नहीं, भावनाओं में बहकर होगा।

ये रहे बसपा और आप के योद्धा

शाहिद अखलाक (बसपा)
मेरठ के पूर्व सांसद और नगर निगम के पूर्व मेयर, बसपा के प्रत्याशी। वर्ष 2009 में निर्दलीय चुनाव लड़कर हारे।

तरकश के तीर : दलित-मुस्लिम समीकरण के भरोसे भाजपा का विजय रथ रोकने का दावा। विकास और सेक्युलरिज्म के नाम पर साल भर से चुनाव प्रचार में जुटे हैं।

डॉ. हिमांशु सिंह (आम आदमी पार्टी)
पूर्व मेजर डॉ. हिमाशु सिंह मेरठ मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद सेना में चले गए। कारगिल युद्ध लड़ा। दादरी (गाजियाबाद) में रिलायंस को जमीन देने के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भागीदारी, काफी दिन जेल में रहे। ‘आप’ प्रत्याशी के रूप में मैदान में।

तरकश के तीर : भ्रष्टाचार के खिलाफ बने जनमानस को भुनाने की कोशिश
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नगमा भी होंगी मैदान में

नगमा (कांग्रेस)
फिल्म अभिनेत्री नगमा को कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतारा है। हालांकि उनका चुनाव प्रचार अभी गति नहीं पकड़ सका है।
तरकश के तीर : रालोद से गठबंधन के भरोसे हर जाति-धर्म व वर्ग के वोटों की उम्मीद। ग्लैमर से लुभाने की कोशिश।

शाहिद मंजूर (सपा)
किठौर विधानसभा क्षेत्र से विधायक और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री, सपा प्रत्याशी। वर्ष 2009 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर तीसरे नंबर पर रहे थे।
तरकश के तीर : विकास के काम, मुस्लिम समीकरण और सभी वर्गों के वोटों के भरोसे चुनावी जंग जीतने का भरोसा।
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