चित्रकूट में मंदाकिनी नदी पर भरत घाट और राम घाट का सौंदर्यीकरण कर उसे भव्य स्वरूप दिया गया।
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चित्रकूटधाम मंडल का सियासी मिजाज 2017 में ऐसा बदला कि इससे पहले महज 2 सीटों पर जीती भाजपा ने यहां की सभी 10 सीटों पर भगवा परचम फहरा दिया। कांग्रेस-बसपा से 3-3 और सपा से उसने दो सीटें छीन लीं। यहां तक कि 2019 के उपचुनावों में भी भगवा खेमे का जलवा कायम रहा। पर, क्या ये जलवा 2022 में भी कायम रहेगा?
बहरहाल, सरकार के पास गिनाने के लिए मंडल में कई अच्छे काम हैं। तो दूसरी तरफ स्थानीय कारणों से विधायकों से नाराजगी भी है। भगवा खेमे के सामने इस नाराजगी से पार पाने की भी चुनौती है।
यहां के सियासी मिजाज की बात करें तो 2017 से पीछे जाना पड़ेगा। 2012 के चुनावों में बांदा की चार सीटों में से तिंदवारी और बांदा सदर कांग्रेस ने जीती थीं तो बबेरू सीट सपा और नरैनी सीट बसपा के खाते में गई थी।
चित्रकूट जिले की दो सीटों में से सदर सपा और मानिकपुर पर बसपा ने कब्जा जमाया था। हमीरपुर की दो सीटों में से सदर पर भाजपा तो राठ सीट पर कांग्रेस ने परचम फहराया था। महोबा जिले की बात करें तो महोबा सीट पर बसपा तो चरखारी सीट पर भाजपा ने कब्जा जमाया था। 2017 में सभी सीटें भाजपा ने जीत लीं। बहरहाल, मंडल में कहीं भी जाइए चुनावी चर्चा छिड़ते ही लोग जल जीवन मिशन के तहत चलाई जा रही ‘हर घर नल से जल योजना’ की तारीफ करते मिल जाते हैं। उनका कहना होता है कि इससे उनकी जिंदगी में काफी बदलाव आएगा।
तारीफ करने वालों में हमीरपुर के पंचोरा गांव के देवी प्रसाद भी हैं। वह कहते हैं, हमारे यहां शुद्ध पेयजल की बड़ी समस्या थी। अब ट्रीटमेंट प्लांट लग रहा है तो हालात बदल जाएंगे। बरसों से इस संकट से लोग जूझ रहे थे। वह कहते हैं, हमीरपुर के ही कुरारा के हरौली में भी इसी तरह का प्लांट लग रहा है। देवी प्रसाद का कहना है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने से क्षेत्रवासियों को काफी राहत मिलेगी।
बिजली व्यवस्था तो सुधरी, पर रोजगार का अभाव
चित्रकूट के मानिकपुर में स्थित आदर्श इंटर कॉलेज में शिक्षक कैलाश मिश्र कहते हैं, यह बात सही है कि बदलाव आए हैं। बिजली आपूर्ति व्यवस्था में सुधार हुआ है, पर सिंचाई के साधनों का अब भी अभाव है। वहीं, रोजगार की बात करें तो यहां के युवा दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद जैसे शहरों में अकुशल श्रमिक की तरह काम करने के लिए मजबूर हैं। क्षेत्र में न तो उद्योग हैं और न ही कुशल श्रमिक बनाने के लिए पर्याप्त और गुणवत्ता वाले शिक्षण व तकनीकी संस्थान। इन सब पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए।
छुट्टा पशुओं के कारण खेत परती छोड़ रहे किसान
चुनावी चर्चा छिड़ते ही बांदा के जितेंद्र कुमार गुप्ता छुट्टा पशुओं की समस्या उठा देते हैं। इससे साफ है कि यहां छुट्टा पशुओं से किसान परेशान हैं। वह कहते हैं, अन्ना प्रथा (मवेशियों को छुट्टा छोड़ देने) ने किसानों की नाक में दम कर रखा है। वह करे भी तो क्या करे? एक तो महंगी खेती, ऊपर से फसलों का नुकसान। कुछ बचता ही नहीं। वह कहते हैं, हालात यह हैं कि लोग खेत परती छोड़ रहे हैं। आगे वह यह भी जोड़ना नहीं भूलते, सरकार को जैविक खेती के लिए न सिर्फ ठोस नीति बनानी चाहिए, बल्कि उसे लागू करने का साहस भी दिखाना चाहिए। हालांकि, चुनावी समीकरण कैसे बन रहे हैं, इस सवाल पर वह कहते हैं कि मुकाबला जोरदार होगा। कौन पार्टी जीतेगी या हारेगी, इसपर मैं कुछ नहीं कह सकता, पर इतना जरूर कहूंगा कि हमारी चाहतें सिर्फ उम्मीद बनकर ही रह गई हैं।
रोजगार बढ़े तभी व्यापार बढ़ेगा...
कर्वी के व्यापारी अमित शुक्ला कहते हैं, इस बार चुनावी समीकरण साधना आसान नहीं होगा। बहरहाल, भाजपा को कड़ी टक्कर मिलती दिख रही है। पर, प्रत्याशियों के सामने आने के बाद ही स्थिति साफ होगी। मुद्दे क्या हो सकते हैं, इस सवाल पर वह कहते हैं, हमारा मंडल रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ा हुआ है। क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तभी तो हमारा व्यापार फलेगा-फूलेगा।
बहुत कुछ तय करेगा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड
वरिष्ठ पत्रकार आलोक द्विवेदी कहते हैं- देखिए, वर्ष 2017 के चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए निसंदेह शानदार रहे। पर, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तब भाजपा के खिलाफ कोई एंटी इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी) फैक्टर नहीं था। पर, इस बार उसके विधायकों का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने है। इसलिए पिछली बार की तरह सिर्फ मोदी लहर के सहारे बेड़ा पार होना उतना आसान नहीं है। लोग इसका भी आकलन कर रहे हैं कि कौन नेता लखनऊ बेस्ड है और कौन स्थानीय।
उदाहरण के तौर पर वह बताते हैं कि महोबा की राजनीति में अच्छी हैसियत रखने वाले कांग्रेस के कुछ प्रमुख ब्राह्मण चेहरे इस बार सपा में चले गए हैं। हमीरपुर के राठ से कांग्रेस के विधायक रहे गयादीन अनुरागी का सपा में शामिल होना भी समीकरणों को प्रभावित करेगा। द्विवेदी कहते हैं कि योगी-मोदी को लेकर क्षेत्र के लोगों में कोई नाराजगी नहीं दिखती। पर, पिछले प्रदर्शन को दोहराने के लिए भाजपा को अपने प्रत्याशी बदलने पड़ सकते हैं। नरैनी सुरक्षित (चित्रकूट) सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। यहां लोधी और निषाद चुनावी समीकरण बना और बिगाड़ सकते हैं।
वीपी सिंह भी तिंदवारी से लड़े थे उपचुनाव
बांदा जिले की तिंदवारी विधानसभा सीट का अहम स्थान है। यह सीट पूर्व में सीमावर्ती जिले फतेहपुर के संसदीय क्षेत्र में शामिल थी। अब हमीरपुर-महोबा संसदीय क्षेत्र में है। पूर्व में यह वीआईपी सीट भी रही है। यहां से तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह उप चुनाव लड़े और जीते थे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र हरिकृष्ण शास्त्री भी यहां से सांसद रहे। अब भाजपा के बृजेश प्रजापति यहां से विधायक हैं।
बांदा सदर सीट : वादे पूरे नहीं हुए इसलिए बदलता रहा मिजाज
बांदा सदर सीट पर कभी कांग्रेस, कभी बसपा तो कभी भाजपा के प्रत्याशी जीते। वर्ष 2017 में भाजपा से चंद्रपाल कुशवाहा विधायक चुने गए। इस सीट का मिजाज प्रयोगवादी क्यों है, इस सवाल पर कृषि विश्वविद्यालय के पास मिले रूपेश कुमार, नरेश पांडेय और दिलीप चंद्र कहते हैं, यहां के लोग हर चुनाव में क्षेत्र में बिजली, पानी, और विकास जैसे मुद्दों को सामने रखते हैं। नेताओं के वादे पूरे होते नहीं, इसलिए जनता बदल देती है। वे कहते हैं, रोजगार के अवसर बढ़े बिना विकास बेमानी होता है। इस मोर्चे पर काम करने वाले को ही हम अपना वोट देंगे। विधानसभा की बबेरू सीट कभी कम्युनिस्टों का गढ़ कही जाती थी।
सीटों का गणित: बांदा (4 सीटें)
बांदा सदर : भाजपा के प्रकाश द्विवेदी विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 80 हजार, ब्राह्मण 30 हजार, वैश्य व मुस्लिम 25-25 हजार, कुशवाहा 27 हजार, यादव 21 हजार, क्षत्रिय व लोधी 15-15 हजार, निषाद व रैकवार 14 हजार, प्रजापति 11 हजार, पाल 5 हजार।
नरैनी (सु.) : भाजपा के राजकरन कबीर विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 94 हजार, ब्राह्मण 42 हजार, यादव 26 हजार, लोधी, मुस्लिम 25-25 हजार, कुर्मी 24 हजार, कुशवाहा व निषाद 16-16 हजार, क्षत्रिय 14 हजार, वैश्य 13 हजार, प्रजापति 10 हजार, साहू व पाल 5-5 हजार।
बबेरू : भाजपा के चंद्रपाल कुशवाहा विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 92 हजार, यादव 60 हजार, कुर्मी 32 हजार, निषाद व मुस्लिम 25-25 हजार, ब्राह्मण 17 हजार, कुशवाहा 16 हजार, क्षत्रिय 15 हजार, प्रजापति 14 हजार, वैश्य 7 हजार।
तिंदवारी : भाजपा के बृजेश कुमार प्रजापति विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 71 हजार, क्षत्रिय 55 हजार, निषाद 53 हजार, प्रजापति 26 हजार, मुस्लिम 22 हजार, यादव 17 हजार, ब्राह्मण 16 हजार, कुर्मी 9 हजार, खंगार 6 हजार, साहू व कुशवाहा 5-5 हजार।
महोबा (2 सीटें)
महोबा : भाजपा के राकेश गोस्वामी विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण करीब 41 हजार, क्षत्रिय 36 हजार, अहिरवार 35 हजार, कुशवाहा 24 हजार, मुस्लिम 20 हजार, यादव 18 हजार, कोरी 15 हजार, प्रजापति 12 हजार, वैश्य 11 हजार, विश्वकर्मा, वाल्मीकि 9-9 हजार, सोनी,
चौरसिया, धोबी, सेन 8-8 हजार, लोधी, माली, निषाद, पाल 7-7 हजार, कुर्मी 5 हजार।
चरखारी : भाजपा के बृजभूषण राजपूत विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : लोधी करीब 70 हजार, ब्राह्मण 45 हजार, अहिरवार 40 हजार, कुशवाहा 30 हजार, धोबी 20 हजार, मुस्लिम 18 हजार, साहू व प्रजापति 15-15 हजार, विश्वकर्मा 11 हजार, वैश्य व सोनी 10-10 हजार, अनुरागी 8 हजार, क्षत्रिय 7 हजार।
हमीरपुर (2 सीटें)
हमीरपुर सदर : भाजपा के युवराज सिंह विधायक हैं। वह 2019 में उपचुनाव में जीते। 2017 में अशोक चंदेल भाजपा से जीते थे।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण करीब 50 हजार, क्षत्रिय व निषाद 40-40 हजार, प्रजापति 30 हजार, अहिरवार 28 हजार, मुस्लिम 24 हजार, यादव 20 हजार।
राठ : भाजपा की मनीषा अनुरागी विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : लोधी करीब 1.20 लाख, ब्राह्मण 40 हजार, निषाद व अहिरवार 30-30 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, यादव 20 हजार, मुस्लिम 15 हजार, वैश्य 10 हजार।
चित्रकूट (2 सीटें)
चित्रकूट सदर : भाजपा के चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण करीब 60 हजार, कुर्मी 45 हजार, मुस्लिम 25 हजार, क्षत्रिय व यादव 20-20 हजार, पाल 10 हजार।
मानिकपुर : भाजपा के आनंद शुक्ला विधायक हैं। शुक्ला 2019 में उपचुनाव में जीते। 2017 में भाजपा के आरके सिंह पटेल जीते थे।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण करीब 40 हजार, कुर्मी 35 हजार, कोल 30 हजार, यादव 20 हजार, मुस्लिम 15 हजार, पाल 12 हजार, क्षत्रिय 10 हजार।