बागपत का नाम आते ही याद आते हैं चौधरी चरण सिंह। यह क्षेत्र उनकी कर्मस्थली के रूप में देश भर में पहचान रखता है। एक और भी खासियत है। यह इलाका राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आता है। सड़कों पर चलते ही कहानी बदलती दिखती है। ज्यादातर सड़कें बदहाल हैं।
मेरठ-बड़ौत, मेरठ-करनाल, दिल्ली-सहारनपुर समेत ज्यादातर मार्गों पर सफर करना किसी चुनौती से कम नहीं। दिल्ली के बेहद नजदीक होते हुए भी न तो इलाज की बेहतर सुविधाएं हैं और न ही उद्योग धंधे।
रेल लाइन का भी विस्तार नहीं हुआ। दिल्ली और सहारनपुर के लिए केवल सिंगल रेल लाइन है। संसदीय क्षेत्र में चार चीनी मिलें हैं लेकिन किसान गन्ना मूल्य भुगतान के लिए तरस रहे हैं। सबसे बड़ी बकायेदार मलकपुर और मोदीनगर चीनी मिलें इसी क्षेत्र में हैं।
37 साल से 'चौधरी' का राज
बागपत संसदीय सीट पर 13 महीने के छोटे कार्यकाल को छोड़कर पिछले 37 साल में पहले चौधरी चरण सिंह और अब चौधरी अजित सिंह सांसद रहे।
इसी इलाके की नुमाइंदगी करते हुए चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे। अजित सिंह सात बार सांसद बने। छह बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा के लिए चुने गए।
एक बार संसदीय उपचुनाव और छपरौली से विधानसभा चुनाव भी जीते। फिलहाल वह केंद्र सरकार में मंत्री हैं। बावजूद इसके दूसरे बड़े नेताओं के क्षेत्रों की तरह इस इलाके का कायाकल्प नहीं हुआ। यह दर्द बागपत को सालता है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि चुनाव में विकास कभी बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता। चौधरी चरण सिंह के नाम और स्वाभिमान के नाम पर मतदान के रुझान पर अब सवाल उठना स्वाभाविक है।
नौजवानों में भी छटपटाहट
छटपटाहट किसानों में ही नहीं नौजवानों में भी है। बड़ौत क्षेत्र के जौहड़ी निवासी मेरठ कॉलेज छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष अमित राणा कहते हैं, बागपत के पिछड़ेपन पर अब जवाबदेही तय करनी होगी।
सड़के हैं न खेतों के लिए पानी। युवाओं के रोजगार के लिए कोई उद्योग भी नहीं है। मेडिकल कॉलेज तो दूर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज तक नहीं हैं।
मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और कई बार केंद्रीय मंत्री देने वाले क्षेत्र के नौजवान अब बागपत की तुलना बादलपुर, सैफई, अमेठी, रायबरेली से करने लगे हैं। चौधरी अजित सिंह को बताना होगा कि नौजवानों के लिए उन्होंने क्या किया?
मलकपुर चीनी मिल क्षेत्र के 225 युवाओं की शादी इसलिए रुकी हुई है कि गन्ने का पेमेंट नहीं हुआ। लोकसभा चुनाव में ये सारी बातें उठेंगी।
जाट आरक्षण ने दी बड़ी राहत
विकास और किसानों के सवालों के बीच जाट आरक्षण ने राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह को बड़ी राहत दी है।
देश खाप के मुखिया और बागपत जिले के सबसे बड़े गांव बावली के निवासी चौधरी सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि अजित सिंह ने आरक्षण दिलाकर जाट बिरादरी के लिए बहुत बड़ा काम किया है।
जाहिर है, उन्होंने राजनीतिक लाभ को देखते हुए यह काम कराया है तो इसका फायदा भी मिलेगा। विकास के मुद्दे पर कहते हैं, कहीं भी चले जाओ, किसी भी नेता के पक्ष और विपक्ष के लोग मिल जाएंगे।
अजित सिंह लंबे समय से सांसद है, वह सभी को संतुष्ट तो नहीं कर सकते।
जनता के सवाल: चौधरी बताएं क्या किया
सच्चाई यह है कि चौधरी साहब (अजित सिंह) को चुनाव के वक्त किसान, जाट, हरित प्रदेश, सब याद आते हैं। पर जीतने के बाद केवल मंत्री पद याद रहता है।
सांसद और केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने क्या किया, यह बताने की उन्हें जरूरत नहीं पड़ती। उन्हें पता है जाट जाएंगे कहां?
हालांकि जाट आरक्षण के बाद माहौल कुछ बदला है फिर भी इस बार उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। अजित सिंह केंद्र सरकार की उस कमेटी में थे, जिसने चीनी मिलों को 6600 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त कर्ज दिया।
उन्हें बताना होगा कि किसानों की बदहाली दूर करने के लिए क्या कराया? (ये विचार हैं किसान अधिकार आंदोलन के संयोजक नरेंद्र सिंह राणा के)
अजित ने नहीं छोड़ी विकास में कसर
चौधरी अजित सिंह पर क्षेत्र की अनदेखी के आरोप गलत हैं। उन्होंने क्षेत्र में कई बड़े विकास कार्य कराए हैं। उन्होंने छपरौली में यमुना नदी पर पुल मंजूर कराया।
इसके निर्माण में हरियाणा सरकार को बराबर का हिस्सेदार बनने के लिए राजी किया। हरियाणा सरकार पहली किस्त के रूप में यूपी को 36 करोड़ रुपये दे चुकी है।
इसके अलावा मेरठ में हवाई अड्डे के विस्तारीकरण और वर्कशॉप की स्थापना को मंजूरी दी। बड़ौत में उड्डयन विभाग की ओर से स्टेडियम निर्माण और दिल्ली-सहारनपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दिलाई।
टटीरी में ओवरब्रिज समेत कई काम काम स्वीकृत कराए हैं। (ये विचार छपरौली के विधायक वीरपाल राठी के हैं)
अजित के लिए पहली बड़ी चुनौती
बागपत लोकसभा सीट पर बसपा नजर गड़ाए हुए है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बसपा को बागपत और बड़ौत सीटों पर जीत हासिल हुई।
हालांकि लोकसभा चुनाव की बात करें तो वर्ष 2009 और 2004 में अजित सिंह के मुकाबले बसपा ही दूसरे नंबर पर रही थी।
लेकिन 2012 से पहले बागपत जिले की किसी विधानसभा सीट पर उसका खाता नहीं खुल सका था।
बसपा के प्रशांत कुमार चौधरी एक साल से दिन-रात चुनावी तैयारियों में जुटे हैं। उनकी पत्नी हेमलता बागपत से विधायक हैं।
दूसरी चुनौती: सत्यपाल का भाजपा खेमे में आना
मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर सत्यपाल सिंह के चुनाव मैदान में आने की अटकलों से भाजपा खेमे में हलचलें बढ़ गई हैं।
सत्यपाल इसी इलाके के रहने वाले हैं और जाट बिरादरी से ही ताल्लुक रखते हैं।
हालांकि दावेदार उनके अलावा और भी हैं लेकिन भाजपा वर्ष 1998 में सोमपाल शास्त्री की तरह बागपत का इतिहास बदलने का ख्वाब संजो रही है।
तब चौधरी अजित सिंह को पहली बार पटकनी देकर सोमपाल शास्त्री भाजपा प्रत्याशी के रूप में सांसद चुने गए थे।
तीसरी चुनौती: मुस्लिम वोटों की लामबंदी
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री के सपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने से इन्कार के बाद सपा ने सिवाल खास के विधायक गुलाम मोहम्मद को चुनाव मैदान में उतारा है।
मुस्लिम मतों की लामबंदी के चलते वह 2012 में विधायक चुने गए थे। लोकसभा चुनाव में चौकोने मुकाबले में उनकी नजर फिर मुस्लिमों की लामबंदी पर टिकी है।
इस क्षेत्र में जाटों के बाद मुस्लिम आबादी के लिहाज से दूसरे नंबर पर आते हैं।