पूर्वांचल की धरती पर होने वाली सियासी जंग पार्टियों या प्रत्याशियों के बीच ही नहीं बल्कि ‘गन’ और ‘जन’ तंत्र के बीच भी होती हुई दिख रही है। इसकी वजह यहां के रणभूमि में बड़ी संख्या में ऐसे चेहरों की मौजूदगी है, जिनकी पहचान बनाने में उनके बाकी कामों से ज्यादा उनकी गन यानी बंदूक की ही भूमिका मानी जाती है।
पर, चेहरों पर संगीन अपराधों के दाग की छाया से मुक्ति की बेकरारी ने इन नए व पुराने चेहरों को सियासत की शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया है। इनमें कई तरह के शख्स हैं। कोई खुद मैदान मेें डटा है तो कोई पत्नी या किसी अन्य करीबी के सहारे दागों को सियासत की चादर से ढकने की कोशिश में जुटा है।
सूबे की सियासत में सक्रिय प्रमुख पार्टियों में शायद ही कोई ऐसी बची हो जिसने ऐसे चेहरों को मैैदान में न उतारा हो। पर, तुर्रा यह कि हर पार्टी सरकार बनने पर अपराधियों को जेल भेजने या यूपी की सीमा से बाहर चले जाने पर मजबूर कर देने की बात को भी बुलंदी के साथ कह रहा है।पर, बात जब वोट मांगने की आए तो इन्हें अपने ऐसे उम्मीदवारों के लिए न वोट मांगने में हिचक है और न मंच साझा करने में।
कहीं पार्टियों की कोशिश दबंग के खिलाफ दबंग उतारकर लड़ाई को पैनी बनाने की है तो कहीं इन दबंगों ने इलाके में अपना रुआब बरकरार रखने की गरज से राजनीति का दामन थाम रखा है। तभी तो जब किसी को उसके पुराने दल ने ठुकराया तो नए दल के सहारे विधानसभा की चौखट लांघने की कोशिश में जुट गया। जिन्हें कोई सियासी सहारा नहीं मिला तो निर्दल ही मैदान में कूद गए।
यह तो जनता को तय करना है कि वह इन्हें कितनी तवज्जो देती है? पर, इतना साफ हो गया है कि इस जमीन के नतीजे सिर्फ जीत-हार ही तय करने वाले हैं बल्कि यह भी साफ करने वाले हैं कि गन के सहारे जन को प्रभावित करने वालों को जनता कितना पसंद या नापसंद करती है। वह भी राजनीतिक दलों की तरह इन्हें स्वीकार कर लेती है या अस्वीकार कर सियासी दलों को राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ चलने का संदेश देती है।
लड़ाई सियासत में मुख्तारियत की
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पूर्वांचल के माफिया व दबंग चेहरों की बात चले तो लोगों की जुबान पर तुरंत जो नाम आते हैं उनमें मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, धनंजय सिंह, विनीत सिंह व जितेंद्र सिंह प्रमुख हैं।
जो पूर्वांचल की सियासत में मुख्तारियत कायम रखने की लड़ाई लड़ रहे है। मुख्तार मऊ की सदर सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। मुख्तार पर कृष्णानंद राय हत्याकांड सहित कुछ मामलों में मुकदमा चल रहा है और वह जेल में हैं।
चार बार जीत चुके अंसारी ने इस बार अपने बेटे अब्बास अंसारी को विधायक बनाने की ठानी है। उनके एक भाई सिगबतुल्ला अंसारी मौजूदा समय में विधायक हैं और फिर किस्मत आजमा रहे हैं।
मुख्तार के लिए सिर्फ इन तीन सीटों की जीत ही नहीं बल्कि आसपास भी अपने समर्थकों की जीत दिलाकर मुख्तारियत कायम करना कसौटी बन गई है। बृजेश सिंह भी जेल में हैं, लेकिन मुख्तार की तरह उनके भी नाम का खौफ कम नहीं माना जाता।
इनके भतीजे सुशील सिंह चंदौली की सैयदराजा सीट से भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। वह पहले भी विधायक रह चुके हैं। वैसे तो सुशील का चेहरा खुद भी दबंग छवि वाला है।
बावजूद इसके न सिर्फ इस सीट की जीत बृजेश के प्रभाव की कसौटी बन गई है बल्कि आसपास की सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की जीत उनकी पकड़ का पैमाना मानी जा रही है।
सुशील के मुकाबले बसपा के टिकट पर कई अपराधों में आरोपी श्यामनारायण सिंह उर्फ विनीत सिंह मैदान में हैं। विनीत भी फिलहाल जेल में हैं। स्वाभाविक है उनकी भी कोशिश इस सीट को जीतकर यह साबित करने की है कि सियासी तौर पर जनता में वह भी कुछ कम मजबूत नहीं है। बृजेश व मुख्तार के बीच दुश्मनी के रिश्तों के मद्देनजर इस सीट पर अंसारी की दिलचस्पी भी है।
ताकि बनी रहे सियासी पहचान
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सिर्फ पुराने ही नहीं बल्कि अपराध की दुनिया के कुछ नए नाम भी सियासी चोला ओढ़कर पहचान व प्रतिष्ठा पाने को कसमसा रहे हैं। ऐसा एक नया नाम अतुल राय का है, जो मुन्ना बजरंगी के करीबी माने जाते हैं।
उन पर कई संगीन मामले दर्ज हैं। गाजीपुर की जमानिया सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में सजा काट रहे अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि भी सियासी संसार में पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
पत्नी की हत्या में आरोपी अमनमणि महराजगंज की नौतनवां सीट से निर्दल उम्मीदवार हैं। प्रेमप्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी जेल में हैं। पर, सियासी पहचान बनाए रखने की कसमसाहट में उन्होंने पत्नी सीमा सिंह को मैदान में उतारा है।
भदोही से सपा विधायक विजय मिश्रा कई संगीन मामलों में आरोपी रहे हैं। उन्हें सपा ने इस बार उम्मीदवार नहीं बनाया तो निषाद पार्टी के प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरकर अपनी सियासी पकड़ को प्रमाणित करने की कोशिश में जुटे हैं।
धनंजय सिंह का नाम भी अपराधों की दुनिया में चर्चित है। सांसद और विधायक रहे चुके सिंह जौनपुर की मल्हनी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। किसी पार्टी से टिकट मिलने में सफलता नहीं मिली तो निषाद पार्टी से उतरकर यह साबित करने की कोशिश में जुटे हैं कि आपराधिक छवि के नहीं बल्कि सियासी सरोकार वाले हैं।