वजह तो भगवान जान सकता है या प्रदेश अध्यक्षजी। पर, भगवा दल के फैसले पर ताज्जुब सभी को हो रहा है।
आखिर अध्यक्षजी ने किस कारण से उन पदाधिकारियों को उन्हीं सीटों का प्रभारी बना दिया जो वहीं पर टिकट के दावेदार थे। कुछ लोग कहते हैं कि फैसले के पीछे सीट पर बगावत रोकना है।
लेकिन कई ऐसे भी हैं जिन्हें फैसला बिल्लियों को ही दूध की रखवाली सौंपने जैसा लग रहा है। इनका मानना है कि अध्यक्षजी भी इन सीटों पर उन्हीं को टिकट चाहते थे जिन्हें प्रभारी बनाया गया है।
बात नहीं बनी। अध्यक्षजी के हाथ में टिकट दिलाना तो था नहीं लेकिन उन्होंने प्रभारी बनाकर उन्हें यह मौका जरूर दे दिया कि जिनमें क्षमता हो तो इसी बहाने संबंधित सीटों से अपने भविष्य की संभावनाएं मजबूत बना लें।