राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पहली बार 2011 में हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में बिना बीएड परीक्षा पास किए सम्मिलित होने वाले अभ्यर्थियों के हक में अपना फैसला दिया है।
आरटीआई से मांगी गई जानकारी में एनसीटीई के क्षेत्रीय निदेशक ने स्पष्ट किया है कि बीएड सत्र 2011-12 में शामिल वह अभ्यर्थी जो 2011 में टीईटी पास कर लिए थे, वह पूरी तरह से अर्ह हैं।
आरटीआई में मिला जवाब
आरटीई से जानकारी मांगने वाले इन अभ्यर्थियों ने 2011-2012 में बीएड परीक्षा में शामिल होने का हवाला देकर टीईटी के लिए आवेदन कर दिया था। इस दौरान बीएड का परिणाम आने से पहले ही टीईटी पास कर लिया था।
बीएड का परिणाम बाद में आने के कारण उस समय टीईटी करवाने वाली संस्था यूपी बोर्ड ने इन छात्रों को प्रमाण पत्र जारी करने से मना कर दिया था।
टीईटी पास इन अभ्यर्थियों ने प्रदेश सरकार की ओर से 72825 शिक्षक भर्ती में भी आवेदन कर दिया था।
भर्ती में कैसे-कैसे आए मोड़
ऐसा कभी नहीं हुआ होगा कि एक पद के लिए आवेदक को 30 से 35 हजार रुपये का आर्थिक भार उठाना पड़ा हो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू हुई वर्ष 2011 के 72825 सहायक अध्यापकों के रिक्त पदों की नियुक्ति प्रक्रिया में यही हुआ।
मायावती सरकार में पहले अधिकतम पांच जनपदों में आवेदन का विकल्प दिया। 500 प्रति जनपद शुल्क जमा कराया। फिर इसी शुल्क पर प्रदेश के सभी जनपदों में आवेदन की छूट दे दी गई।
फिर अखिलेश सरकार में इन्हीं पदों के लिए नए सिरे से आवेदन मांगे। प्रत्येक जनपद के लिए आवेदन का शुल्क 500 रुपये निर्धारित किया। ऐसे में जनपद वार नियुक्तियां होने की स्थिति में ज्यादातर आवेदकों ने औसतन 40 से 45 जनपदों में आवेदन किए और 20 से 25 हजार रुपये आर्थिक भार उठाया।
कहीं साजिश का हिस्सा तो नहीं...
सोशल मीडिया पर इन नियुक्तियों को लेकर बहस भी गर्माई। टीईटी पास बीएड डिग्री धारक प्रदेश सरकार को जमकर आडे़ हाथ ले रहे थे। उन्हें आशंका थी कि कहीं यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं।
हालांकि, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पहली बार 2011 में हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में बिना बीएड परीक्षा पास किए सम्मिलित होने वाले अभ्यर्थियों के हक में अपना फैसला दिया है।
इससे उन्हें नौकरी मिलने की संभावना काफी बढ़ गई है।