उस चुनाव में लोगों ने मेरी खूब मदद की। मैं जहां पहुंचता, वहां लोग रुपये देते। जिनके पास रुपये नहीं थे, वे गेहूं-चावल दे देते। जहां रात हो जाती वहीं मैं रुक जाता। सुबह होने पर दूसरे गांव के लिए चल देता। 1977 का चुनाव जीत गया। जिस गांव से धमकी मिली थी, वहां की पोलिंग पर भी जीता। मजेदार बात यह रही कि 300 रुपये जेब में लेकर चुनाव लड़ने चला था, नतीजा आया तब भी 480 रुपये जेब में बचे थे।
- लखनऊ पहुंचा तो अटल बिहारी वाजपेयी ने बुलाया। वह बोले, ‘दीक्षित जी हमारे साथ आ जाओ।’ मैंने उनके चरण छुए और बोला, जनता पार्टी नहीं चलेगी। इसलिए इसमें नहीं आ सकता। जब आप इससे अलग होंगे तब जरूर आपके पास आ जाऊंगा।’
- जनता पार्टी टूटने के बाद जब भारतीय जनता पार्टी बनी तो मैं तुरंत अटल जी के पास पहुंच गया। उनसे बोला, ‘आपके आदेश का पालन करने के लिए हाजिर हूं।’ वह दिन है और आज का दिन, भाजपा में ही हूं।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ अटलजी के सपनों को साकार कर रहे हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय के संकल्पों को धरती पर उतार रहे हैं। पर, अटल तो अटल ही थे। उनके जैसा नेता न पहले हुआ और न आगे होगा।