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‘खुद को महाराजा समझते हैं यूपी के कई अफसर’

Tue, 21 Apr 2015 02:21 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार है...। आम आदमी को हक नहीं मिलता...। फाइलें चकरघिन्नी बनी रहती हैं...। ब्यूरोक्रेसी पर ऐसे सवाल अक्सर उठते हैं। पर ब्यूरोक्रेसी हर बार कोई न कोई तर्क देकर, ऐसे सवालों को खारिज करती रही है।
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सिस्टम में भ्रष्टाचार, संवेदनहीनता, तालमेल की कमी पर सवाल उठाया है 1976 बैच की यूपी की आईएएस अफसर रहीं प्रोमिला शंकर ने। अपनी किताब ‘गॉड्स ऑफ करप्शन’ में उन्होंने पूर्व केंद्रीय कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम से लेकर मौजूदा कैबिनेट सचिव अजित सेठ तो सूबे के पूर्व कैबिनेट सचिव शशांक शेखर, पूर्व मुख्य सचिव अखंड प्रताप सिंह तक पर सवाल उठाए हैं।

वे लिखती हैं कि कई अफसर तो खुद को महाराजा से कम नहीं समझते। जैसे ही उन्हें बड़ा पद मिलता है, उन्हें लगता है मानो उन्हें साम्राज्य मिल गया हो। ब्यूरोक्रेसी को आईना दिखातीं प्रोमिला यही नहीं रुकतीं वह मंत्रियों, नेताओं और अफसरों के उस गठजोड़ पर भी हमला करती हैं जो भ्रष्टाचार दिनों-दिन बढ़ रहा है।
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अपने ऑफिस को दिया था फाइव स्टार जैसा लुक

प्रोमिला ने अपनी किताब में लिखा कि जब अखंड प्रताप सिंह गन्ना विभाग में प्रमुख सचिव थे तो उन्होंने अपने ऑफिस को फाइव स्टार होटल जैसा लुक दिया। विभाग बदल जाने पर भी उस ऑफिस रूम को नहीं छोड़ा।

- अगर पैरवी सही नहीं हो तो सचिवालय में फाइलें महीनों वैसी ही पड़ी रहेंगी।

- कोई भी अफसर अपना ऑफिशियल मोबाइल फोन नहीं उठाता... आखिर क्यों अफसरों को ऑफिशियल मोबाइल फोन दिया जाता है?

मंत्री:
कई मंत्री या तो हिस्ट्रीशीटर रहे हैं या हैं। मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने अपनी तिजोरी में करोड़ों-करोड़ रुपये जमा कर लिए।

दोनों के गठजोड़ पर
ऐसी भी चर्चाएं रहीं कि नोएडा अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर यादव सिंह समेत कुछ दफ्तरों में नोट गिनने की मशीनें लगी हैं। कुछ मंत्री और अफसर इन सब गतिविधियों को मैनेज करते हैं।
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यह कहते हैं रिटायर्ड अफसर

इस पर रिटायर्ड आईएएस विजय शंकर चौबे कहते हैं कि लोगों को यह भरोसा ही नहीं हो रहा कि उनकी मुसीबत में कलेक्टर व एसडीएम मदद के लिए आएंगे।

वहीं, रिटायर्ड आईएएस एसपी आर्य का कहना है कि ब्यूरोक्रेसी में सेवा भाव नहीं, अफसरशाही भरती जा रही।

जबकि रिटायर्ड आईएएस अफसर एसएन शुक्ल का कहना हे कि लोकसेवा तो अब अपनी व राजनीतिक आकाओं की सेवा का साधन मात्र रह गई है।
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