प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विधानसभा चुनावों में लघु व सीमांत किसानों की कर्जमाफी का वादा योगी सरकार के लिए लक्ष्मण रेखा बन गई है। कर्जमाफी के प्रति लगातार प्रतिबद्धता जता रही योगी सरकार इसका फॉर्मूला निकालने के चक्कर में कैबिनेट की पहली औपचारिक बैठक नहीं कर पा रही है। सूबे में 19 मार्च को शपथ ग्रहण करने वाली योगी सरकार का रविवार को पहला पखवारा भी पूरा हो जाएगा।
मुख्यमंत्री योगी सत्ता संभालने के बाद ताबड़तोड़ निर्णय कर रहे हैं। गवर्नेंस से लेकर लॉ एंड आर्डर तक में बदलाव साफ दिखे, इस पर उनका खास फोकस है। भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों पर जांच के आदेश भी दे हैं।
वे न सिर्फ पंचम तल पर घंटों बैठ कर फाइलों के निपटाने में खासा वक्त दे रहे हैं, बल्कि फरियादियों की सुनवाई भी कर रहे हैं। सीएम के तौर पर औचक निरीक्षण की परंपरा उन्होंने दशकों बाद शुरू की है। लेकिन योगी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक नहीं हो पा रही है।
इसकी मुख्य वजह भाजपा का अपने संकल्प-पत्र में लघु व सीमांत किसानों का फसली ऋण माफ करने का वादा और प्रधानमंत्री का चुनावी सभाओं में सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में ही कर्जमाफी करवाने का आश्वासन है।
पहली बैठक में ही किया था कर्जमाफी के सुझाव का ऐलान
प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा के लिए पीएम कर्जमाफी का वादा पहली कैबिनेट बैठक के लिए लक्ष्मण रेखा बन गई है। सूत्रों के मुताबिक अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को शपथ ग्रहण के तत्काल बाद मंत्रिपरिषद के सदस्यों की होने वाली पहली बैठक में ही सरकार की ओर से कर्जमाफी के एलान का सुझाव दिया था। लेकिन सीएम योगी इस पर सहमत नहीं हुए।
उन्होंने इस सुझाव को आश्वासन के अनुरूप नहीं माना और कामचलाऊ निर्णय की परंपरा को बढ़ाने से इन्कार कर दिया। साथ ही अफसरों को कर्जमाफी पर आने वाले भार और सरकार की ओर से उसकी अदायगी का मुकम्मल फॉर्मूला निकालने का निर्देश दिया। ऐसे में कैबिनेट बैठक का थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है।
कैबिनेट बाई सर्कुलेशन से परहेज
पिछले दरवाजे के रास्ते से फैसले के आरोप न लगे इसके लिए योगी सरकार कैबिनेट बाई सर्कुलेशन से जरूरी फैसले लेने से भी बच रही है। बताया जाता है कि महाधिवक्ता का इस्तीफा स्वीकार करने जैसे प्रक्रियागत फैसले ही बाई सर्कुलेशन से हुए हैं। इसी वजह से नए महाधिवक्ता की नियुक्ति भी अब तक नहीं की गई है।
सरकार पर पड़ेगा 63 हजार करोड़ का भार
शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि कर्जमाफी ऐसा फैसला है जिस पर सरकार की पूरी अर्थव्यवस्था और विकास प्रतिबद्धताओं का भविष्य टिका है। इसलिए जल्दबाजी में निर्णय नहीं हो सकता है। इस पर 63,000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम का भार सरकार पर आने का अनुमान है।
सूबे की अर्थव्यवस्था ऐसी नहीं है जो इतने बड़े भार को उठाने के साथ ही अन्य विकास कार्यों को भी रफ्तार दे सके। ऐसे में प्रदेश सरकार केंद्र सरकार से मदद की मांग या कर्ज लेने जैसे कई विकल्पों पर गौर कर रही है।
शासन के वरिष्ठ अधिकारी केंद्रीय वित्त मंत्रालय में जाकर इस संबंध में बात भी कर चुके हैं। अधिकारी के मुताबिक विचार-विमर्श के बाद तय फॉर्मूले को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस लिहाज से कैबिनेट की पहली बैठक अगले सप्ताह होने की उम्मीद है।