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कन्या भ्रूण की जांच कराने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर गिरेगी गाज, हो जाएं सर्तक

Fri, 23 Nov 2018 12:45 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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डेमो
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गर्भ में कन्या भ्रूण की जांच करने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटरों के खिलाफ अब सीधे एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। अब तक मथुरा, आगरा, संभल, मेरठ के एक-एक और अमरोहा के दो अल्ट्रासाउंड सेंटरों परएफआईआर दर्ज कराई गई है। 
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परिवार कल्याण महानिदेशक डॉ. नीना गुप्ता ने बताया कि पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत अल्ट्रासाउंड सेंटर पर एफआईआर नहीं कराई जा सकती। इसमें कोर्ट में मुकदमा दर्ज कराया जाता है। वहीं, डिकॉय ऑपरेशन में छापेमारी के साथ सीधे एफआईआर भी दर्ज कराई जा सकती है।  

उन्होंने बताया कि मुखबिर की सूचना के बाद पिछले दिनों योजनाबद्ध तरीके से इन सेंटरों पर छापा मारा गया और मौके से गर्भ में भ्रूण की जांच के शुल्क के रूप में दिए गए रुपये भी बरामद किए गए। अमरोहा के दोनों अल्ट्रासाउंड सेंटरों का सीएमओ ऑफिस में पंजीकरण नहीं था।
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डिकॉय ऑपरेशन के स्टेट नोडल ऑफिसर डॉ. अजय घई ने बताया कि इस अभियान में मुखबिर और फेक कस्टमर को आर्थिक मदद भी दी जाती है। फेक कस्टमर को एक लाख रुपये, उसके सहायक को 40 हजार रुपये और मुखबिर को 60 हजार रुपये देने का प्रावधान है। डिकॉय ऑपरेशन और एफआईआर होने पर पहली किस्त, कोर्ट में गवाही होने पर दूसरी किस्त और फैसला होने पर तीसरी किस्त दी जाती है।  
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जानें, क्या है ‘डिकॉय ऑपरेशन’

- फोटो : डेमो
डॉ. नीना गुप्ता ने बताया कि प्रदेश में घटते बाल लिंगानुपात की रोकथाम के लिए बनी मुखबिर योजना के तहत राज्यस्तरीय डिकॉय समिति गठित की गई थी। डिकॉय ऑपरेशन चलाने के लिए शासनादेश 23 जून 2017 को जारी हुआ था। इसका मकसद लालच देकर भ्रूण लिंग की जांच करने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटर के संचालक को रंगे हाथों पकड़ना है।

इसमें गर्भवती महिला की रजामंदी से उसे ‘डिकॉय’ बनाकर भ्रूण के लिंग की जांच के लिए भेजा जाता है, जिससे अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालक डिकॉय टीम के जाल में फंस जाए। महिला से एक शपथपत्र भी लिया जाता है, जिसमें केस का फैसला होने तक उसकी मदद की गारंटी ली जाती है। इसके बाद जिला प्रशासन की मदद से अल्ट्रासाउंड सेंटर पर छापेमारी की जाती है।  
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