इस बार का विधानसभा चुनाव पूर्वांचल की सियासत की नई पटकथा तैयार कर रहा है। बाहुबलियों के वारिसों का चुनावी सियासत में प्रवेश अपने साथ तमाम सवालों को लेकर आया है। नतीजों से ही पता
चलेगा कि उत्तर प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण जैसे शब्दों को जन्म देने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्वांचल की सियासत की भावी डगर किस तरफ जाएगी। बाहुबल व जनबल में कौन किस पर भारी पड़ेगा। बाहुबलियों के घरों के नए चेहरे सियासत की विरासत को आगे बढ़ाएंगे या जनता इन्हें हराकर पूर्वांचल की सियासत में नई इबारत लिखेगी।
दरअसल, बदले माहौल में इस बार बाहुबली सीधे-सीधे चुनाव में भाग नहीं ले पाए। इनमें किसी ने अपने पुत्र को उतारा है, तो किसी ने किसी अन्य सदस्य को। ऐसे में पूर्वांचल के सियासी रण में यह देखना काफी दिलचस्प हो गया है कि चुनावी मैदान में उतरे इन वारिसों का जनता क्या भविष्य तय करती है। साथ ही ये वारिस जनादेश का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने का फैसला करते हैं या फिर बाहुबल से ही सियासत की राह को अपनाने को तरजीह देते हैं।
इस बार के चुनाव में बाहुबल और आपराधिक छवि के लोगों को लेकर बने प्रतिकूल माहौल को देखते हुए मुख्तार अंसारी ने जहां अपने बेटे अब्बास अंसारी को तो सुभासपा से चुनाव मैदान में उतारा ही है, साथ ही अपने बड़े भाई और कई बार के विधायक सिगबतुल्लाह अंसारी के बेटे मन्नू अंसारी को भी पिता के सियासी वारिस के तौर पर गाजीपुर की मुहम्मदाबाद सीट से सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतार दिया है। प्रयागराज की सियासत में यह पहली बार हो रहा है कि अतीक अहमद के परिवार के कोई भी सदस्य इस बार के चुनाव मैदान में नहीं उतरा है। अलबत्ता यह जरूर कहा जा रहा है कि अतीक व उनके बेटे चुनाव मैदान में उतरे कई उम्मीदवारों को जिताने के लिए अंदरखाने से मदद जरूर कर रहे हैं।
इस बार भी नेपथ्य में ही हैं उदयभान जैसे कई बाहुबली
भदोही जिले के औराई विधानसभा से विधायक रहे उदयभान लगातार तीसरे चुनाव में भी नेपथ्य में ही हैं। इसी प्रकार विनीत सिंह भी एक बार एमएलसी रहे, लेकिन इसके बाद वह भी चुनाव से दूर ही रहे। हालांकि, उन्होंने कई दलों से टिकट के लिए गुहार जरूर लगाई थी। उमाकांत या उनके परिवार से भी इस बार कोई चुनाव मैदान में नहीं उतरा है। अलबत्ता, उमाकांत के भाई रमाकांत अपने बेटे व भाजपा विधायक अरुणकांत की सीट से सपा उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने इस बार अरुणकांत को टिकट नहीं दिया है।
हरिशंकर तिवारी पहले ही सौंप चुके हैं विरासत
बाहुबली के तौर पर सबसे पहले सियासी सफर करने वाले हरिशंकर तिवारी ने अब सक्रिय राजनीति से दूरी तो बना ली है, लेकिन वह अपनी विरासत अपने बेटे विनय शंकर पांडेय व भीष्म शंकर को सौंप चुके हैं। एक बेटा विधायक है, तो दूसरा सांसद रह चुका है। इसी प्रकार सुल्तानपुर में भी चंद्रभद्र सिंह व यशभद्र सिंह भी पिता व पूर्व विधायक इंद्रभद्र सिंह और पूर्व सांसद चाचा जयभद्र सिंह की सियासी विरासत संभाल रहे हैं। सोनू तो एक बार विधायक भी रह चुके हैं। जबकि मोनू दो बार चुनाव हार चुके हैं और इसौली से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।
धनंजय भी बेताब
जौनपुर के बाहुबली धनंजय सिंह पटरी से उतरी सियासत की गाड़ी को इस बार पटरी पर लाने के लिए मल्हनी सीट से जदयू के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। हालांकि, वह अपना दल (एस) से टिकट लेने के प्रयास में थे, लेकिन कामयाब नहीं हुए।