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वरुण गांधी Exclusive: अखिलेश की यूं ही तारीफ या है कोई भविष्य का इशारा, गांधी सरनेम पर कैसे दिया जवाब; पढ़िए खास बातचीत

Wed, 09 Feb 2022 04:32 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

भाजपा सांसद वरुण गांधी पिछले कुछ समय से अपनी ही पार्टी की केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ काफी मुखर हैं। अमर उजाला के लिए विनोद अग्निहोत्री को दिए गए साक्षात्कार में वरुण गांधी ने न केवल भाजपा पर निशाना साधा बल्कि अपनी भावी राजनीति का संकेत देते हुए अखिलेश और जयंत चौधरी की भी जमकर तारीफ की। पेश हैं बातचीत के अंश...
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वरुण गांधी
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विस्तार
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पिछले कुछ समय से आपके तेवर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को लेकर काफी तीखे हैं, इसकी वजह?

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मैं राजनीति में लालबत्ती की चाह लेकर नहीं आया हूं। जनता ने मुझे चुन कर भेजा है, अपने बुनियादी सवाल उठाने के लिए। मैं अंतरात्मा की आवाज की राजनीति करता हूं। मैंने अपनी सांसद की तनख्वाह वैसे किसान परिवारों को समर्पित कर दी है, जिस परिवार के मुखिया ने परिस्थितियों से मजबूर होकर आत्महत्या कर ली, ये किसान परिवार बिजनौर से लेकर मंगलौर, कहीं के भी हो सकते हैं। मेरा शिद्दत से मानना है कि किसी भी लोकतंत्र को मजबूत बनाने का रास्ता जन आंदोलन की कोख से निकलता है। आपको याद हो होगा कि मैंने कैसे अन्ना आंदोलन को दिल से समर्थन दिया था। अन्ना आंदोलन के पक्ष में मैं दिन भर रामलीला मैदान में जाकर बैठा था। मेरा मानना है कि ऐसे आंदोलन राजनीतिक शुद्धिकरण के लिए जरूरी होते हैं। मैं देश का इकलौता सांसद हूं, जिसने संसद में ही इस बात का विरोध करने का साहस दिखाया कि सांसदों को खुद अपनी तनख्वाह बढ़ाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। फिर इस बारे में एक कमीशन गठित कर ये अधिकार उस कमीशन को सौंप दिए गए। मैंने संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल लाकर ‘राइट टू रीकॉल’ की बात की, मेरा बस यह कहना है कि यदि जनता अपने सांसद के काम-काज से खुश नहीं है तो उन्हें वापिस बुलाने का अधिकार उनके पास क्यों नहीं होना चाहिए?

भाजपा के आप अकेले ऐसे सांसद थे, जिन्होंने तीनों कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन का समर्थन किया?
देश की कृषि व्यवस्था पहले से ही अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उस पर ये तीनों कृषि कानून एक अत्याचार ही साबित होते। मैंने इस बात को समझा और किसान भाइयों के पक्ष में यथाशक्ति अपनी आवाज उठा कर अपनी नैतिक प्रतिबद्धता और राजनैतिक जवाबदेही का पालन किया। जब ये किसान भाई दिल्ली बॉर्डर पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे, टेंट में रात गुजार रहे थे और दिल्ली की रूह कंपा देने वाली ठंड में अपनी जान गंवा रहे थे, तो कई रातों तक मैं ठीक से सो नहीं पाया। पर, मुझे इस बात का यकीन था कि 700 से ज्यादा किसान भाइयों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।

लेकिन आप खुद किसानों का समर्थन करने धरना स्थल पर क्यों नहीं गए?

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मैं किसान भाइयों के बीच जाना चाहता था, पर उनका आग्रह हुआ कि कोई राजनैतिक व्यक्ति उनके बीच न आए। इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए मैंने वहां जाना टाल दिया। 

आज किसान आंदोलन कहां खड़ा है?
किसान आंदोलन स्थगित हुआ है, समाप्त नहीं। अभी भी उनसे जुड़े अत्यंत ज्वलंत मुद्दों का समाधान निकाला जाना अति आवश्यक है। ये हमारे अपने खून हैं, इनके साथ हठधर्मिता दिखाना कोई राजनैतिक समझदारी का काम नहीं। जैसे एमएसपी पर कानूनी गारंटी, लखीमपुर कांड में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री का इस्तीफा, जो अब भी नहीं हुआ है। समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें संरक्षण देकर केंद्र सरकार क्या साबित करना चाहती है? इस आंदोलन के दौरान 700 से ज्यादा किसान भाई शहीद हो गए। उन परिवारों को आज तक मुआवजा नहीं मिला है। किसानों पर दर्ज मुकदमों की भी अभी तक वापसी नहीं हुई है। ‘वादा खिलाफी दिवस’ मना कर किसान भाइयों ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं कि किसान आंदोलन फिर से शुरू हो सकता है। हम इन्हें मजबूर क्यों कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के किसान अपने ‘वोट की चोट’ कार्यक्रम और तेज कर दें।

आपके अखिलेश यादव और जयंत चौधरी से निजी रिश्ते काफी अच्छे बताए जाते हैं?
अखिलेश जी को मैंने 20 वर्षों में जितना पाया है, उनके बारे में इतना तो मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि वे एक सच्चे इंसान हैं। बोलते कम हैं, पर बातों के बहुत धनी हैं। जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। कभी झूठ नहीं बोलते। मैं उनकी शादी में भी शामिल हुआ था। एक बात जो पक्के तौर पर उनके बारे में कह सकता हूं कि वे किसी के प्रति अपने दिल में कोई मैल नहीं रखते। चाहे वह उनका धुर राजनैतिक विरोधी ही क्यों न हो। जयंत जी मेरे भाई की तरह हैं। भले ही उन्होंने पिछले छह-सात वर्षों का मुश्किल समय देखा है, पर उनकी रगों में एक सच्चे किसान का ही खून दौड़ता है। उनमें मुझे उनके दादा चौधरी चरण सिंह जी का अक्स दिखता है।

सरकार और संगठन में आपकी अनदेखी हुई है, क्या आपको यहां गांधी सरनेम की कीमत चुकानी पड़ी है?
मैं हमेशा से अपनी अंतरात्मा की, राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज सुनता हूं। अपने फैसले दिल पर हाथ रख के लेता हूं, बस इस बात का ख्याल रखता हूं कि मेरे इस फैसले में हाशिए पर खड़ा वह आखिरी आदमी जरूर शामिल रहे। क्या आप इस सच से मुंह छुपा सकते हैं कि पिछले साल यानी 2021 में 84 फीसदी भारतीय परिवारों की आय घट गई है। जबकि इस दौरान बेहद अमीर अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़ कर 142 हो गई है। मत भूलिए कि 2020 में अकेले 4.6 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं। भारत एक युवा देश है जहां 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम आयुवर्ग के युवाओं की है, क्या हम उन युवा सपनों को एक नया मुकाम दे रहे हैं? उनके लिए नई नौकरियों के अवसर पैदा हो रहे हैं? तो मैं सवाल कैसे न पूछूं? अगर युवाओं के रोजगार की बात उठाना, किसानों को समर्थन देना, महिला सुरक्षा की चिंता करना गलत है तो फिर मानिए मैं दोषी हूं, मैं हर सजा भुगतने को तैयार हूं। 

उत्तर प्रदेश के इन चुनावी नतीजों से देश की राजनीति कितनी प्रभावित होगी?
2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता हमें 325 सीटों पर भारी बहुमत से सरकार में लेकर आयी थी। यह जनादेश इस चाह के साथ दिया था कि अब उत्तर प्रदेश में आमूलचूल बदलाव आएगा। केवल आधारभूत ढांचे में ही नहीं, पूरी शासकीय प्रणाली में। पर क्या जनता की ये उम्मीदें पूरी हुईं?

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यूपी में क्या होगा?
इस युवा देश को बेरोजगारी की सबसे बड़ी मार झेलनी पड़ रही है। अभी आपने देखा पिछले दिनों रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं के दौरान क्या हुआ? आपने देखा कि कैसे गया से लेकर इलाहाबाद तक सरकार के तुगलकी फरमान का विरोध कर रहे छात्रों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं। रेलवे के आरआरबी-एनटीपीसी के 35 हजार खाली पोस्ट के लिए एक करोड़ 25 लाख छात्रों ने अप्लाई किया। रेलवे भर्ती बोर्ड ने जब 20 फीसदी की जगह जब 5 फीसदी भर्ती  की बात करने लगा तो छात्रों के सब्र का बांध टूट गया और वे विरोध-प्रदर्शन पर उतर आए। पुलिस ने उन पर जम कर लाठियां बरसायीं। क्या ऐसे मिलेगा युवा सपनों को न्याय? ऐसे पूरी होगी उनके एक अच्छे रोजगार की चाह? वैसे भी इन दिनों महंगाई ने भी लोगों का जीवन बदहाल कर दिया है। उनकी क्रयशक्ति कम हो गई है। पीडीएस सिस्टम से लेकर शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों की सरकारी योजनाओं को भ्रष्टाचार से मुक्त किया जा सके तो लोग राहत की सांस ले पाएंगे। इस बार का चुनाव महंगाई, बेरोजगारी, समस्याग्रस्त किसान, दलित उत्पीड़न, नारी सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों के इर्द-गिर्द ही लड़ा जा रहा है। जो आप शोर सुनते हैं 80-20 (हिंदू-मुस्लिम) या 85-15 (पिछड़े-अगड़े) का, दरअसल वोट इन सब पर होगा ही नहीं। वैसे भी मैं किसी वोटर को उसके धर्म या जाति के आधार पर देखने के खिलाफ  हूं। मेरे हिसाब से आज वोटर लोकतंत्र का सबसे बड़ा ‘स्टेक होल्डर’ है, या तो उसे अपने फैसलों में शामिल कीजिए, वरना वह आपको अपने फैसलों में शामिल नहीं करेगा।

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