पिछले कुछ समय से आपके तेवर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को लेकर काफी तीखे हैं, इसकी वजह?
भाजपा के आप अकेले ऐसे सांसद थे, जिन्होंने तीनों कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन का समर्थन किया?
देश की कृषि व्यवस्था पहले से ही अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उस पर ये तीनों कृषि कानून एक अत्याचार ही साबित होते। मैंने इस बात को समझा और किसान भाइयों के पक्ष में यथाशक्ति अपनी आवाज उठा कर अपनी नैतिक प्रतिबद्धता और राजनैतिक जवाबदेही का पालन किया। जब ये किसान भाई दिल्ली बॉर्डर पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे, टेंट में रात गुजार रहे थे और दिल्ली की रूह कंपा देने वाली ठंड में अपनी जान गंवा रहे थे, तो कई रातों तक मैं ठीक से सो नहीं पाया। पर, मुझे इस बात का यकीन था कि 700 से ज्यादा किसान भाइयों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।
लेकिन आप खुद किसानों का समर्थन करने धरना स्थल पर क्यों नहीं गए?
आज किसान आंदोलन कहां खड़ा है?
किसान आंदोलन स्थगित हुआ है, समाप्त नहीं। अभी भी उनसे जुड़े अत्यंत ज्वलंत मुद्दों का समाधान निकाला जाना अति आवश्यक है। ये हमारे अपने खून हैं, इनके साथ हठधर्मिता दिखाना कोई राजनैतिक समझदारी का काम नहीं। जैसे एमएसपी पर कानूनी गारंटी, लखीमपुर कांड में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री का इस्तीफा, जो अब भी नहीं हुआ है। समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें संरक्षण देकर केंद्र सरकार क्या साबित करना चाहती है? इस आंदोलन के दौरान 700 से ज्यादा किसान भाई शहीद हो गए। उन परिवारों को आज तक मुआवजा नहीं मिला है। किसानों पर दर्ज मुकदमों की भी अभी तक वापसी नहीं हुई है। ‘वादा खिलाफी दिवस’ मना कर किसान भाइयों ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं कि किसान आंदोलन फिर से शुरू हो सकता है। हम इन्हें मजबूर क्यों कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के किसान अपने ‘वोट की चोट’ कार्यक्रम और तेज कर दें।
आपके अखिलेश यादव और जयंत चौधरी से निजी रिश्ते काफी अच्छे बताए जाते हैं?
अखिलेश जी को मैंने 20 वर्षों में जितना पाया है, उनके बारे में इतना तो मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि वे एक सच्चे इंसान हैं। बोलते कम हैं, पर बातों के बहुत धनी हैं। जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। कभी झूठ नहीं बोलते। मैं उनकी शादी में भी शामिल हुआ था। एक बात जो पक्के तौर पर उनके बारे में कह सकता हूं कि वे किसी के प्रति अपने दिल में कोई मैल नहीं रखते। चाहे वह उनका धुर राजनैतिक विरोधी ही क्यों न हो। जयंत जी मेरे भाई की तरह हैं। भले ही उन्होंने पिछले छह-सात वर्षों का मुश्किल समय देखा है, पर उनकी रगों में एक सच्चे किसान का ही खून दौड़ता है। उनमें मुझे उनके दादा चौधरी चरण सिंह जी का अक्स दिखता है।
सरकार और संगठन में आपकी अनदेखी हुई है, क्या आपको यहां गांधी सरनेम की कीमत चुकानी पड़ी है?
मैं हमेशा से अपनी अंतरात्मा की, राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज सुनता हूं। अपने फैसले दिल पर हाथ रख के लेता हूं, बस इस बात का ख्याल रखता हूं कि मेरे इस फैसले में हाशिए पर खड़ा वह आखिरी आदमी जरूर शामिल रहे। क्या आप इस सच से मुंह छुपा सकते हैं कि पिछले साल यानी 2021 में 84 फीसदी भारतीय परिवारों की आय घट गई है। जबकि इस दौरान बेहद अमीर अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़ कर 142 हो गई है। मत भूलिए कि 2020 में अकेले 4.6 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं। भारत एक युवा देश है जहां 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम आयुवर्ग के युवाओं की है, क्या हम उन युवा सपनों को एक नया मुकाम दे रहे हैं? उनके लिए नई नौकरियों के अवसर पैदा हो रहे हैं? तो मैं सवाल कैसे न पूछूं? अगर युवाओं के रोजगार की बात उठाना, किसानों को समर्थन देना, महिला सुरक्षा की चिंता करना गलत है तो फिर मानिए मैं दोषी हूं, मैं हर सजा भुगतने को तैयार हूं।
उत्तर प्रदेश के इन चुनावी नतीजों से देश की राजनीति कितनी प्रभावित होगी?
2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता हमें 325 सीटों पर भारी बहुमत से सरकार में लेकर आयी थी। यह जनादेश इस चाह के साथ दिया था कि अब उत्तर प्रदेश में आमूलचूल बदलाव आएगा। केवल आधारभूत ढांचे में ही नहीं, पूरी शासकीय प्रणाली में। पर क्या जनता की ये उम्मीदें पूरी हुईं?