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ये रही यूपी में भाजपा की शानदार विजय की वजह

Mon, 19 May 2014 10:38 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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सूबे में भाजपा की सीटों का आंकड़ा 10 से 71 पहुंच गया।
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यूपी की आबादी में 50 प्रतिशत से ज्यादा भागीदारी रखने वाली पिछड़ी जातियों का समर्थन पाए बिना भाजपा को इतनी बड़ी कामयाबी नहीं मिल सकती थी।

जाहिर है कि चुनाव में पिछड़ी जातियों ने भाजपा को भरपूर समर्थन दिया। प्रदेश प्रभारी बनाए गए अमित शाह शायद यूपी की पिछड़ी जातियों की ताकत पहले ही जान चुके थे।

इसीलिए उन्होंने यूपी में पैर रखने के साथ पिछड़ी जातियों को जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया। उन्होंने पूरे प्रदेश का दौरा किया।

पिछड़ी जातियों के सम्मेलनों में हिस्सा लिया। साथ ही पिछड़ी जातियों के बीच प्रभाव रखने वाले नेताओं को भी आगे किया।
भाजपा का अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल से गठबंधन भी कराया।

शाह ने जोड़ा इन जातियों को

शाह ने अपने सहयोगी के रूप में दो अति पिछड़े चेहरों सत्येन्द्र कुशवाहा और रामेश्वर चौरसिया को यूपी में भाजपा के जमीनी आधार को मजबूत बनाने में जुटाया।

कल्याण सिंह, उमा भारती को भी आगे किया। मोदी ने जब विजय शंखनाद रैलियों के जरिये यूपी में भाजपा की पहुंच व पकड़ मजबूत बनाने का अभियान शुरू किया तो कल्याण सिंह व उमा भारती जैसे चेहरों को प्रमुखता से मंच पर जगह दी गई।

लोगों से वादा किया गया कि केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी तो उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में गठित सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को लागू करके पिछड़ों की सभी जातियों के लिए उनकी आबादी के अनुसार आरक्षण का इंतजाम किया जाएगा।

जातियों की गणित पर टिकट

पिछड़ों की लामबंदी के लिए भाजपा ने जातियों की गणित को ध्यान में रखकर टिकट दिए। सूबे की 36 सामान्य सीटों पर 17 ब्राह्मण, 15 राजपूत, 1 भूमिहार, 3 वैश्यों के अलावा 27 पिछड़े उम्मीदवार बनाए गए।

पिछड़े वर्ग की जातियों में से जाट व लोधी जाति के 5-5, कुर्मी जाति के 4, कुशवाहा, मौर्य व सैनी जाति के 3, निषाद, कश्यप 1, पाल बघेल 1, कुम्हार 1, राजभर 1, साहू 1 और अन्‍य 3 को उम्मीदवार बनाया गया।

क्षेत्रों के सामाजिक समीकरणों के मद्देनजर टिकट दिए गए। मसलन उमा भारती को झांसी से, कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर को एटा से, मुकेश राजपूत को फर्रुखाबाद से टिकट देकर मुलायम सिंह यादव के प्रभाव वाले इलाकों में अति पिछड़ों को भाजपा के साथ लामबंद करने की कोशिश की गई, जो सफल रही।

फतेहपुर से साध्वी निरंजन ज्योति को टिकट देकर कश्यप व निषाद तो हमीरपुर से ठाकुर और बांदा से ब्राह्मण को टिकट देकर इस क्षेत्र में प्रभावी जातियों के जोड़ से भाजपा के लिए वोटों का इंतजाम किया गया।

हिंदुत्व को धार भी

1991 में कल्याण सिंह के नेतृत्व में आस्था व पिछड़ों की लामबंदी ने भाजपा को यूपी में बहुमत की सरकार बनाने का मौका दे दिया था। साथ ही लोकसभा की 51 सीटें भाजपा की झोली में डाल दी थीं।

इसीलिए उस प्रयोग को दोहराने में शाह ने संकोच नहीं किया। प्रभारी के रूप में उत्तर प्रदेश में काम शुरू करने से पहले उन्होंने अयोध्या जाकर श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन किए और मंदिर निर्माण का प्रतिबद्धता जताई।

शायद उन्हीं का सुझाव रहा कि भाजपा ने यूपी में आस्था व जाति की ताकत को गोलबंद करने के उद्देश्य से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनावी समर में उतरने का फैसला किया।

सफल रही रणनीति

शाह की रणनीति सफल रही। मोदी न सिर्फ खुद को पिछड़ी जाति के रूप में चर्चित कराने में कामयाब हुए बल्कि उन्होंने राम मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बोले बगैर अपने हिंदुत्ववादी चेहरे को भी धार दी।

टोपी न पहनकर और तमाम हमला होने के बावजूद गोधरा पर माफी न मांगकर उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया कि वह हिंदुत्व व संस्कृति से समझौता करने वाले नहीं हैं।

उनकी इस छवि ने जहां अगड़ों को उनके साथ खड़ा कर दिया तो पिछड़े भी लामबंद हो गए।

बौने पड़े मुलायम

भाजपा का मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना मुलायम सिंह यादव व पिछड़े वर्ग के अन्य नेताओं को भारी पड़ा।

संघ परिवार पिछड़ों को यह संदेश देने में कामयाब रहा कि पिछड़ी जातियों के लिए पहली बार अपने बीच का प्रधानमंत्री बनवाने का एक अवसर है। संघ परिवार की यह रणनीति सफल रही।

पिछड़ी जातियों के बीच मुलायम सिंह यादव मोदी से छोटे पड़ गए। पिछड़ों को लगा कि मुलायम सिंह को वोट देने से भी उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं दूर-दूर तक नहीं हैं।

वे कांग्रेस का ही समर्थन करेंगे। ऐसे में वह हिंदुत्व व जातीय स्वाभिमान के सरोकारों के साथ मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए पिछड़ी जाति भाजपा के साथ लामबंद हो गईं।

मुजफ्फरनगर पर भी सधे समीकरण

मुजफ्फरनगर दंगे पर सपा सरकार की भूमिका ने भी मोदी व भाजपा की मदद की। भाजपा को पश्चिम में पिछड़ों के बीच पैठ बनाने में मदद मिली।

भाजपा ने हिंदुओं के साथ सौतेले व्यवहार का मुद्दा बनाया। इससे पश्चिम के अगड़े ही नहीं बल्कि जाट व गूजर सहित अन्य पिछड़ी जातियां व दलित जातियां भाजपा के साथ खड़ी हो गईं।

रालोद के नेता चौधरी अजित सिंह की मुजफ्फरनगर पर लंबी चुप्पी ने भी भाजपा की मदद की। इसका प्रमाण चौधरी अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत का पराजित होना है।
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अति पिछड़ों पर ज्यादा ध्यान

शाह ने अपना ध्यान मुख्य रूप से पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियों में लगभग 6 प्रतिशत कुर्मी, 5 प्रतिशत मुराई, मौर्य, काछी, कुशवाहा, 4 प्रतिशत लोध, 4 प्रतिशत जाट, 4 प्रतिशत गड़रिया, बघेल व पाल, 4 प्रतिशत साहू व तेली, 4 प्रतिशत ही कुम्हार, प्रजापति, 2 प्रतिशत गुर्जर, लगभग इतने-इतने प्रतिशत ही बढ़ई, राजभर, भुर्जी, नोनिया, चौहान पर केंद्रित किया।

इसके लिए इन जातियों से संबंधित चेहरों को इनके बीच भेजा गया। उनके भीतर आरक्षण का लाभ देने की आस जगाई तो उन्हें मुस्लिम आरक्षण का खतरा भी दिखाया गया।

बताया गया कि सपा, बसपा व कांग्रेस पार्टियां मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण की पैरोकारी कर रही हैं।

इससे पिछड़ों का आरक्षण घट जाएगा। उनके हिस्से में सिर्फ 9 प्रतिशत आरक्षण ही आएगा। इसके लिए जिलों में सामाजिक न्याय सम्मेलन नाम से पिछड़ी जातियों के कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
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