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इस 'मास्टर प्लान' से भाजपा ने बसपा से छीनीं 17 सीटें

Mon, 19 May 2014 03:05 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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भाजपा ने प्रदेश में इन 17 सीटों पर जीतने के लिए खास रणनीति अपनाई, खास बात यह है कि मायावती ने भी इसी फॉर्मूले को अपनाकर खुद की ताकत बढ़ाई थी।
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प्रदेश में लोकसभा की 17 सुरक्षित सीटों पर भाजपा का झंडा फहराना अपने आप में सूबे के समीकरणों में बदलाव की कहानी कह रहा है।

बसपा सुप्रीमो मायावती भले ही दलित वोटों में बिखराव न होने का दावा कर रही हों लेकिन विश्लेषण करें तो उनका यह दावा सही नजर नहीं आता है।

साफ दिखता है कि भाजपा ने पुराने फॉर्मूले अगड़े व दलित गठजोड़ से बसपा के चुनावी फैक्टर में सेंध लगा दी है।

दलितों के लिए बनाई विशेष रणनीति

भाजपा ने सूबे के 22 प्रतिशत दलित वोटों को मोड़ने को विशेष रणनीति बनाकर काम किया। इस वजह से न सिर्फ सुरक्षित सीटों पर बल्कि बाकी की सीटों पर भी उसे इसका लाभ मिला। भगवा रणनीतिकारों ने इन 17 सुरक्षित सीटों के लिए विशेष रणनीति बनाई।

इसके लिए पुराने नतीजों का विश्लेषण किया गया। विश्लेषण में ये तथ्य सामने आए कि सुरक्षित सीटें जनसंघ काल से ही संगठन के उम्मीदवारों के लिए काफी सुरक्षित रही हैं।

दलित, अगड़ों तथा अति पिछड़ों के समीकरण से पार्टी इन सीटों पर झंडा फहराती रही है। अविभाजित उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सुरक्षित 18 सीटों में पार्टी के पास 14 तक रह चुकी हैं। बीच में कुछ कारणों से इन सीटों पर भाजपा को नुकसान हुआ।

पर, मायावती दलित चेहरा होने के बावजूद इन सीटों पर कभी भाजपा जैसी कामयाबी हासिल नहीं कर पाईं। लिहाजा इन सीटों पर विशेष ध्यान देकर पार्टी का ग्राफ बढ़ाया जा सकता है।

मायावती ने भी अपनाया था यही फॉमूर्ला

विश्लेषण में यह तथ्य भी सामने आया कि बसपा के यूपी में मजबूती से उभरने की वजह मायावती का दलित चेहरा और भाजपा का पुराना फॉर्मूला ही है।

मायावती ने इस फॉर्मूला पर काम करके और दलितों के दर्द को उभारकर सियासी ताकत हासिल की है। अगर दलितों के दर्द पर मरहम लगा लिया जाए और लोगों के दिमाग में यह बात बैठाई जा सके कि मायावती दलितों के वोट से सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाती हैं, दलितों की नहीं तो काम बन सकता है।

प्रदेश प्रभारी अमित शाह व सह प्रभारी सुनील बंसल व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने इसी दिशा में काम किया। सुरक्षित सीटों पर लोगों को अलग से लगाया गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी मदद ली गई। सेवाभारती और दलित बस्तियों में काम करने वाले विश्व हिंदू परिषद कार्यकर्ताओं को बस्तियों में सक्रिय किया गया। संघ से जुड़े व्यक्तियों को इन सीटों का प्रभारी बनाया गया।

मायावती के खिलाफ माहौल बनाया

भाजपा ने दलित बस्तियों में सामाजिक समरसता भोज सहित अन्य कार्यक्रम आयोजित कराए। प्रचार से परहेज रखते हुए पार्टी के लोग इन बस्तियों में भेजे गए। स्थानीय लोगों के साथ उनकी बैठकें हुईं।

नरेंद्र मोदी और गुजरात का हवाला देते हुए दलितों खासतौर से नौजवानों के बीच शिक्षा व रोजगार से जुड़े सवाल उठाए गए।

उनके दिमाग में यह बात बैठाई गई कि मायावती ने उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई काम नहीं किया।

लोगों के बीच यह सवाल उठाया गया कि बसपा में मायावती के अलावा दूसरा कौन सा दलित चेहरा कद वाला है। इसके जवाब में भाजपा के अनुसूचित वर्ग के कई नेताओं के नाम गिनाए गए।

बसपा के कांग्रेस समर्थन पर सवाल

संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने दलितों व अति पिछड़ों के दिमाग में यह बात भी बैठाई कि बसपा जिस कांग्रेस का समर्थन कर रही है, उसकी तरफ से धर्मांतरण करने वाले दलितों को भी अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ देने की बात हो रही है। इससे दलितों का कोटा घटेगा।

दलित नौजवानों के बीच तथ्य देकर बताया गया कि मायावती भाषणों में तो दलितों की बात करती हैं लेकिन इनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया।

प्रदेश में पांच साल मुख्यमंत्री रहीं लेकिन दलितों के लिए नौकरी का इंतजाम नहीं किया। यहां तक कि सफाई कर्मचारियों तक में दूसरे लोगों के लिए दरवाजे खोलकर दलितों के अवसर घटाए।

यह भी बताया गया कि केंद्र सरकार में 8 लाख पद खाली पड़े रहे, मायावती चाहतीं तो दबाव डालकर इनकी भर्ती शुरू कराकर दलित वर्ग के नौजवानों के लिए अवसर मुहैया करा सकती थीं। पर उन्होंने ये भी नहीं किया।

हिंदुत्व को भी धार

यह सवाल भी उठाया गया कि मायावती पिछले कुछ दिनों से सभी दलितों को बौद्ध बता रही हैं। वह हिंदू दलितों को खत्म कर देना चाहती हैं।

स्थानीय स्तर पर मुजफ्फरनगर से लेकर, दलित बालिकाओं के उत्पीड़न सहित अन्य कई घटनाओं का उल्लेख करके भी दलितों को लामबंद करने व हिंदुत्व को धार देने की कोशिश की गई। लोगों को बताया गया कि कांग्रेस और सपा की राह पर मायावती भी सिर्फ मुसलमानों की पैरोकारी करती हैं।

कई घटनाओं पर मायावती सिर्फ इसलिए नहीं बोलीं कि मुस्लिम नाराज न हो जाएं। समझाया गया कि बसपा का दलित प्रेम सिर्फ जाटवों तक सीमित है। इसके लिए दलित वर्ग के विधायकों, सांसदों, मंत्रियों से लेकर बसपा के पदाधिकारियों का ब्यौरा तक दलित नौजवानों के बीच बताया गया।

उदाहरण देकर यह भी बताया गया कि भाजपा दलितों में सभी जातियों को साथ लेकर चलती है। केंद्र में सरकार बनी तो वह सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू करके आरक्षण का लाभ सभी जातियों में उनकी आबादी के अनुसार बांटेगी।
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भाजपा ने साधे समीकरण

उम्मीदवार तय करने में भी भाजपा ने दलित जातियों के समीकरण पर काम किया। उदाहरण के लिए हाथरस से धोबी जाति के उम्मीदवार राजेश दिवाकर को प्रत्याशी बनाया गया तो नगीना से डॉ. यशवंत के रूप में जाटव प्रत्याशी उतारा गया।

शाहजहांपुर से कृष्णा राज के रूप में पासी उम्मीदवार देकर समीकरण साधने की कोशिश की गई।

सुरक्षित 18 सीटों का नतीजा (1999 तक)
वर्ष-भाजपा-बसपा-कांग्रेस-सपा-अन्य
1991-09-00-01-00-08                
1996-14-02-00-02-00
1998-11-02-00-05-00
1999-07-05-00-05-01

उत्तराखंड बनने के बाद 17 सीटों का हाल
वर्ष-भाजपा-बसपा-कांग्रेस-सपा-अन्य
2004-03-05-01-07-01
2009-02-02-02-10-01
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