सूत्र बताते हैं कि कुछ डॉक्टरों ने टीबी एवं सांस से जुड़ीं बीमारियों में इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को भी इलाज में शामिल किया है। टीबी के मरीजों में दी जाने वाली पैराजिनामाइट, इथमबुटाल और लियोफ्लाक्सिन से भी कुछ मरीजों को राहत मिली है।
हालांकि, अभी तक अधिकृत रूप से किसी भी रेजिमन को मंजूरी नहीं मिली है। केजीएमयू में भर्ती तीनों मरीजों में वायरस से जुड़ीं बीमारियों से जुड़े समूह की दवाएं दी गई हैं। इनके परिणाम सकारात्मक आ रहे हैं। फिलहाल चिकित्सक गोपनीयता का हवाला देकर अभी इसे सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं।
केजीएमयू मेडिसिन विभाग के डॉ. डी हिमांशु का कहना है कि स्वाइन फ्लू, मलेरिया, एचआईवी और टीबी सहित अन्य बीमारियों की कई दवाएं कोरोना के मरीजों पर कारगर साबित हुई हैं। यह मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है कि उसे किस समूह की दवा दी जाए। निरंतर शोध किया जा रहा है। उम्मीद है कि जल्द इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।
कोरोना को लेकर दुनियाभर में शोध शुरू हो गए हैं। हर मरीज की हिस्ट्री रखी जा रही है। संक्रामक रोग नियंत्रण में लगी चिकित्सकों की टीम मरीजों का डाटा इकट्ठा कर रही है। सूत्रों का कहना है कि विभिन्न प्रदेशों के चिकित्सकों ने मरीजों के डाटा और इलाज में इस्तेमाल दवाओं के समूह का आकलन शुरू कर दिया है।
डब्ल्यूएचओ, आईसीएमएमआर, एनआईवी पुणे सहित विभिन्न चिकित्सा शोध संगठनों की ओर से प्रयोग शुरू कर दिए गए हैं।
मरीजों के इलाज में लगी चिकित्सकों की टीम अलग-अलग व्हॉट्सअप ग्रुप से आपसी मशविरे में लगी है। कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज में लगे प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के डॉक्टरों का भी समूह बन गया है। इसमें किस स्थिति के मरीज में कौन सी दवा कारगर पाई गई है, इसे लगातार अपडेट किया जा रहा है।
यह डॉक्टरों का व्यक्तिगत समूह है। बताया जाता है कि डॉक्टर इस पर भी मशविरा करते हैं कि किस देश के पॉजिटिव मरीज पर एचआईवी की कौन सी दवा कारगर रही और किस पर मलेरिया की दवा का असर दिखने लगा है। इसी तरह केजीएमयू के डॉक्टरों का भी अलग ग्रुप है।
इसमें मरीजों के इलाज में लगी टीम के सदस्यों को जोड़ा गया है। इस पर रेजिडेंट डॉक्टर आपसी चर्चा के साथ सीनियर संकाय सदस्यों से मशविरा करते रहते हैं।