डॉ. अनीता ने बताया कि सीटी स्कैन व एमआरआई कर नहीं सकते थे। एक्स-रे व ब्रांकोस्कोपी से पता नहीं लग रहा था कि गर्दन में घुसा पेचकस आहार नाल में है या सांस की नली में। सांस नली के बगल से गुजर रही नसें कितनी क्षतिग्रस्त हैं, इसका भी पता नहीं था।
नस कटने पर घायल के पैरालिसिस होने का खतरा था। ऐसे में तय किया गया कि पूर्ण बेहोशी के बजाय सिर्फ लोकल एनेस्थीसिया (सुन्न) दिया जाए, ताकि आपरेशन के दौरान कोई नस प्रभावित होती है तो मरीज बता सके कि उसका कौन सा हिस्सा काम नहीं कर रहा है। काफी सोच विचार के बाद उसका आपरेशन बेहोशी के बजाय बजाय सुन्न करके किया गया।