सर्जरी विभाग में सर्जरी के बाद अब बेहतर है नवजात
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पेट की परत नहीं होने से प्रसव के समय नवजात की आंतें बाहर आ गईं। केजीएमयू के डॉक्टरों ने सर्जरी कर आंत को व्यवस्थित कर दिया है। इससे बच्ची की जान बच गई है। वह दूध पीने लगी है। हालांकि उसकी पेट की परत बनने में करीब तीन साल लगेगा।
सीतापुर के रावा गढ़ी निवासी यासमीन को 20 दिसंबर को प्रसव हुआ। प्रसव के बाद बच्चे की हालत देख वहां के चिकित्सक घबरा गए और केजीएमयू रेफर कर दिया। पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रो. जेडी रावत ने इमरजेंसी में बच्चे को भर्ती करने के बाद सर्जरी की।
आंतों को फिर से मूल स्वरूप में व्यवस्थित किया। करीब आठ घंटे बाद आंतें क्रियाशील हो गईं। इसके बाद पेट की परत के स्थान पर आर्टिफिशियल एंटीबायोटिक्स कवर लगाया गया। तीन दिन बाद उसे मां का दूध दिया गया, जो पचने लगा।
धीरे-धीरे उसकी शारीरिक क्रियाएं दुरुस्त हो गईं। दो जनवरी को बच्चे को अस्पताल से छुट्टी दे गई। धीरे-धीरे पेट की परत बढ़ने लगेगी और आर्टिफिशियल कवर हटा दिया जाएगा। इसमें करीब तीन साल का वक्त लगेगा।
समस्या : पेट की परत ही नहीं थी
प्रो. जेडी रावत
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प्रो. जेडी रावत ने बताया कि इस बीमारी को ओमफैलोशील कहा जाता है। यह अत्यंत गंभीर बीमारी है। करीब चार हजार बच्चों में किसी एक को होती है। इसमें पेट की परत नहीं बनती है। इसमें पेट की एक झिल्ली के सहारे ही आंतें टिकी रहती हैं।
इस बीमारी वाले 50 फीसदी शिशुओं में हृदय व रीढ़ की हड्डी में विकृति आ जाती है। बच्चों के बचने की गुंजाइश कम होती है। गर्भावस्था के दौरान होने वाले अल्ट्रासाउंड में स्थिति पकड़ में आ जाती है। प्रसव के दौरान सावधानी बरतनी होती है। सिजेरियन प्रसव कराया जाता है, ताकि झिल्ली न फटे और आंतें बाहर न आने पाएं। संभव है कि इस बच्चे के बारे में अंदाजा नहीं लग पाया हो।
देखें- इस टीम ने दी नई जिंदगी
प्रतीकात्मक तस्वीर
चुनौतियां : बिखर गईं थीं आंतें
डॉ. जेडी रावत ने बताया कि केजीएमयू में पहले भी इस बीमारी से ग्रसित मरीज आते रहे हैं, लेकिन यह केस जटिल था। झिल्ली फटने से आंतें बिखर गई थीं। आंतरिक हिस्से में संक्रमण फैलने का डर था। बच्चे का हार्ट का फंक्शन कमजोर था। वजन भी कम था। जीवन रक्षक उपकरण पर भी रिस्पांस नहीं मिल रहा था।
इस टीम ने दी नई जिंदगी
सर्जरी करने वाली टीम मेें डॉ. जेडी रावत के साथ डॉ. सुधीर, डॉ. गौरव, डॉ. गुरुमीत, डॉ. निरपेक्ष, एनेस्थीसिया से डॉ. अनिता, डॉ. सरिता सिंह, डॉ. विनोद श्रीवास्तव, एवं सिस्टर वंदना शामिल थीं।