केजीएमयू के कार्डियोथोरेसिक सर्जन प्रो. शैलेंद्र कुमार यादव ने सिकुड़ी हुई सांस नली का ऑपरेशन कर मरीज की जान बचाने में सफलता हासिल की है। अभी सांस नली को नीचले हिस्से से जोड़ने के बाद गले तक एक ट्यूब से जोड़ा गया है। इससे मरीज की सांस चल रही है। उसे दो दिन बाद डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।
करीब आठ हफ्ते बाद दूसरे चरण के ऑपरेशन के जरिये सांस नली को गले से जोड़ा जाएगा। इस ऑपरेशन में करीब 12 टांके लगे। ऑपरेशन करीब ढाई घंटे तक चला। सिकुड़ी सांस नली को ऑपरेशन के जरिये मरम्मत करने का प्रदेश में यह पहला मामला बताया जा रहा है।
प्रो. शैलेंद्र कुमार ने दावा किया कि अभी तक देश के बड़े चिकित्सा संस्थानों ने इस तरह का कोई ऑपरेशन नहीं किया है। कुछ ऑपरेशन पहले किए गए, लेकिन सिकुड़ने वाले स्थान को जोड़ने में सफलता नहीं मिल पाई थी। सोनभद्र निवासी अजित (26) हेड इंजरी (मस्तिष्क पक्षाघात) के चलते करीब एक माह वेंटिलेटर पर था।
उसे सांस की नली में ट्यूब डाली गई थी। लगातार कृत्रिम सांस लेने से उसकी सांस की नली दो जगह से सिकुड़ गई थी। इससे सांस फूल रहा था। बेचैनी थी। मरीज खाना-पीना छोड़ दिया था। सर्जरी ही अंतिम रास्ता था। लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों में 10 फीसदी में यह समस्या आती है। अलग-अलग अस्पतालों में जब मरीज को राहत नहीं मिली तो परिवारीजन 22 दिसंबर को केजीएमयू ले आए।
केजीएमयू में सिर्फ 40 हजार में हुआ इलाज
डॉक्टर
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यहां ईएनटी विभाग के विशेषज्ञों ने जांच की तो पता चला कि वह सांस खींच नहीं पा रहा है। इस पर सर्जरी विभाग की टीम से संपर्क किया। सर्जरी विभाग के कार्डियोथोरेसिक सर्जन प्रो. शैलेंद्र कुमार यादव ने जांच की तो पता चला कि दो जगह से सांस की नली सिकुड़ने से फेफड़े तक सांस पहुंच नहीं पा रही थी।
उन्होंने पहले पाइप के जरिये सांस देने की कोशिश की तो मरीज को आराम मिलने लगा। इसके बाद सांस नली की मरम्मत करने की योजना बनाई गई। सांस नली को काट कर दोबारा मरम्मत करने की बात सुनते ही परिवारीजन बेचैन हो गए।
चिकित्सक के समझाने के बाद 26 दिसंबर की रात ऑपरेशन किया गया। सांस नली को ट्रैकिया स्टेट ट्यूब डालकर जोड़ दिया गया। इससे उसकी लंबाई पहले जैसी हो गई। निजी अस्पताल में इस सर्जरी में करीब 10 से 15 लाख रुपये का खर्च आएगा। केजीएमयू में सिर्फ 10 हजार रुपया खर्च हुआ है। 25 से 30 हजार रुपया ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट में खर्च हुआ। पूरा खर्च 40 हजार हुआ।
डॉक्टरों की इस टीम ने की सर्जरीः सर्जरी विभाग के प्रो. शैलेंद्र कुमार यादव के साथ रजीडेंट डॉ भूपेंद्र सिंह, डॉ धीरेंद्र कुमार, डॉ अभिषेक कुमार, डॉ समीक्षा, डॉ अजय कुमार एवं एनेस्थीसिया से डॉ रमन की टीम मौजूद थी।
आठ हफ्ते बाद दोबारा होगी सर्जरी
डेमो
प्रो. शैलेंद्र ने बताया कि सीने को खोल कर आहार नाल सहित अन्य नलिकाओं को बचाते हुए नीचले हिस्से में जाया गया। सांस नली के जिस-जिस हिस्से में सिकुड़न थी उसे काट कर अलग किया गया। इसके बाद सांस नली को आपस में जोड़ा गया।
इसके बाद उसे गले तक ले आया गया। गले के पास चीरा लगाकर बाहर से नली लगा दी गई है। इससे मरीज की सांस चल रही है। उसे दो दिन बाद डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। सांस नली को निचले हिस्से से जोड़ा गया है, लेकिन गले से अभी उसे पूरी तरह से जोड़ा नहीं गया है।
आठ हफ्ते बाद मरीज की स्थिति ठीक हो जाएगी तो दोबारा ऑपरेशन करके गले से सांस नली को जोड़ा जाएगा। इस दौरान अभी उसके गले में लगाई गई सांस लेने की कृत्रिम नली को निकाल दिया जाएगा। इससे वह सामान्य मरीजों की तरह सांस लेने लगेगा।
सांस नली के दो जगह से सिकुड़ने की वजह से वह छोटी हो गई थी। ऐसे में नली को खींचकर बढ़ाना और आहार नाल में कट न लगने पाए, यह बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। आहार नाल प्रभावित होने की वजह से बेहोश करने में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस ऑपरेशन में बाईपास तक की जरूरत होती है। इसे जनरल सर्जरी में नहीं किया जा सकता है। बिना बाईपास के मरीज का ऑपरेशन करने में सफलता हासिल की गई है।