इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पारिवारिक विवाद के एक अहम फैसले में कहा कि पति के खिलाफ क्रूरता साबित होने पर उसका तलाक का वाद डिक्री (मंजूर) होना चाहिए था, न कि पत्नी की ओर से दाखिल दांपत्य संबंधों के निर्वहन का दावा।
कोर्ट ने पारिवारिक अदालत लखनऊ के उस निर्णय को पलट दिया जिसमें पति के खिलाफ साफ तौर पर क्रूरता के सबूत होने के बावजूद पति का पत्नी से तलाक लेने के दावे को खारिज कर पत्नी के दांपत्य संबंधों के निर्वहन का दावा मंजूर किया गया था। कोर्ट ने इस अहम नजीर के साथ पति पत्नी के बीच 37 साल पहले हुए विवाह को भंग कर दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ल की खंडपीठ ने पति द्वारा दाखिल दो अपीलों पर दिया। इनमें पारिवारिक अदालत लखनऊ के उस फैसले और आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें पति के खिलाफ साफ तौर पर क्रूरता के सबूत होने के बावजूद पति का पत्नी से तलाक लेने के दावे को खारिज कर पत्नी के दांपत्य संबंधों के निर्वहन का दावा मंजूर किया गया था।
पति का कहना था कि वर्ष 1986 में उसका विवाह हुआ था। पति का आरोप था कि बच्चे होने के बाद उसकी पत्नी उसके साथ क्रूरतापूर्ण आचरण करने लगी। जिसमें उसे बाथरूम में बंद करना, बच्चों के सामने माता पिता को गाली देना आदि शामिल था।
इससे क्षुब्ध होकर पति ने वर्ष 2012 में पारिवारिक अदालत में तलाक का दावा दाखिल किया। पति का कहना था इसके बाद पत्नी ने घरेलू हिंसा के आरोपों समेत गुजारा भत्ता मांगने के मुकदमे उसके खिलाफ दाखिल किए। इनमें पत्नी ने दांपत्य संबंधों के निर्वहन का दावा भी दाखिल किया।
पारिवारिक अदालत ने हालांकि, पति का क्रूरता का दावा आंशिक रूप से मना लेकिन पति पत्नी के अलग रहने का पर्याप्त सबूत नहीं पाया। अदालत ने पत्नी के पक्ष में टिप्पणी करते हुए पति के तलाक के दावे को खारिज कर पत्नी के दांपत्य संबंधों के निर्वहन का दावा मंजूर कर लिया था। पारिवारिक अदालत के इसी फैसले और आदेश के खिलाफ पति ने दो अपीलें दाखिल कर चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक अदालत के फैसले में पत्नी द्वारा पति के खिलाफ क्रूरता का मत साफ था। इस मत का तर्कसंगत परिणाम तलाक का दावा मंजूर किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि अगर क्रूरता साबित थी तो ऐसे में क्रूरता की दोषी पत्नी दांपत्य अधिकारों के निर्वहन की पात्र नहीं थी।
ऐसे में पारिवारिक अदालत को कानूनी प्रावधानों के तहत तलाक का दावा मंजूर करना चाहिए था और दांपत्य अधिकारों के निर्वहन के दावे को खारिज किया जाना चाहिए था। ऐसा न करके पारिवारिक अदालत ने तथ्यों और कानून के तहत त्रुटि की। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने दंपती के विवाह को भंग कर अपीलें मंजूर कर लीं।