अमेरिका को पूरी दुनिया में स्वर्ग की तरह देखा जाता है। वहां का ग्रीनकार्ड लेने के लिए होड़ मची हुई है। लोगों को लेकिन समझना चाहिए कि सबसे अधिक जीडीपी वाला देश भी शांत नहीं है। वहां भी देवासुर संग्राम छिड़ा हुआ है। अधिक जीडीपी ही वहां इस अशांति का कारण बन गई है।
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बुधवार को आईआईएम लखनऊ में 32वें स्थापना दिवस पर व्याख्यान देने आए मशहूर लेखक और माइथोलॉजिस्ट डॉ. देवदत्त पटनायक का कहना था कि हमारे वेद और पुराण असल में पौराणिक कथाओं के जरिए विचारों का संकलन करने का जरिया हैं। इन विचारों को संकलित कर एक व्यवस्थित रूप देने का काम ऋषि-मुनियों ने किया।
विचार सनातन हैं, यह हमेशा जिंदा रहते हैं। ज्ञान और विचारों आगे बढ़ना चाहिए। यह काम ही वेद, पुराण और शास्त्र करते हैं। विचारों के इस व्यवस्थित संकलन को तीन भागों में बांटा गया है। जंगल, फल और बीज।
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वेद असल में वह जंगल हैं जिनमें महाभारत, रामायण जैसे पुराण पैदा होते हैं। महाभारत जैसे फल से गीता जैसे बीज को जन्म मिला। प्रबंधन भी वेद-पुराण की तरह ही लोगों को व्यवस्थित कर उनका उद्देश्य पूरा कराने का नाम है। ऐसे में अगर वेद-पुराण के महत्व को समझा जाए, तो यह प्रबंधन और कॉरपोरेट के संदर्भ में भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
सम्पन्नता से फैली है अमेरिका में अशांति
धन रूपी भूख के पीछे मची दौड़ पर उनका कहना था कि अमेरिका को स्वर्ग के रूप में देखा जाता है। स्वर्ग में इंद्र राजा है, उसके पास समृद्धि है। यश है। इसके बाद भी वह असुरों और ऋषियों से चिंतित है। वहां देवासुर संग्राम छिड़ा हुआ है। अमेरिका में भी यही हुआ। वहां भी अशांति फैली हुई है। यह अशांति भी उनकी संपन्नता से पैदा हुए विकारों की वजह से है।
यह उसी तरह है जैसे आप संपन्न हैं। आपका पड़ौसी भूखा है। वह आपसे खाना मांगता है। आप उसकी भूख शांत करने के लिए कई शर्त रखते हैं। ऐसे में देवासुर संग्राम शुरू होता है। इस दौरान आईआईएम के निदेशक प्रो. अजीत प्रसाद मौजूद रहे।
मानव का जन्म उद्देश्य के लिए हुआ
माइथोलॉजी पर करीब 30 किताब लिख चुके डॉ. पटनायक का कहना था कि ग्रीक सभ्यता में कहा गया है कि मनुष्य के जीवन का एक उद्देश्य है। वहां उद्देश्य के लिए मानव जीवन का दर्शन नहीं सिखाया जाता है। यही वजह है कि वहां के कई हीरो अपने उद्देश्य की तलाश में कई बड़े कारनामे कर गए।
कॉरपोरेट में भी देखें तो हमें समझना होगा कि हमारे जीवन का अर्थ क्या है। अब आम के पेड़ से सेब तो पैदा नहीं होगा। अब ऐसे में सेब के कीमती होने पर तनाव लेने की जरूरत नहीं है। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव को कॉरपोरेट से खत्म करने की जरूरत है।
बिलगेट्स, नेहरू नहीं बन सकते
डॉ. पटनायक का कहना था कि बिल गेट्स और नेहरू की जिंदगी का उद्देश्य अलग था। अब कोई उनके जैसा नहीं बन सकता। सभी के जीवन का उद्देश्य अलग-अलग है।
मानव में मन की मौजूदगी ही भटकाव को पैदा करती है। इसका प्रबंधन करने की जरूरत है। इसके बाद तनाव खुद से दूर हो जाएगा। अगर यह बदलाव नहीं किया जा सकता तो अपनी जीवन के अर्थ की तलाश नहीं हो सकती। यह प्रबंधन का फेल होना कहा जाता है।
प्रकृति में सभी बराबर हैं
डॉ. पटनायक ने बताया कि प्रकृति में सभी बराबर हैं। अगर शेर ताकतवर है तो उसकी भी कुछ कमजोरी हैं। गाय कमजोर है तो उसका भी मजबूत पक्ष है। शेर के सामने भी चुनौतियां हैं। ऐसे में खुद के जीवन के अर्थ को समझने और उस दिशा में बढ़ने की जरूरत है। कोई अगर आज किसी कंपनी का सीईओ है। वह फोर्ब्स की सूची में शामिल है। कल वहां कोई और होगा।
सभी वेद, उपनिषद, पुराणों को भी देखें तो वहां एक ही कहानी और दर्शन मिलता है। कुछ भी स्थाई नहीं है। इसके बाद भी सफलता पा चुके लोग देवासुर संग्राम से जूझ रहे हैं। अपने अंदर के असुर से ही वे लड़ रहे हैं। ऐसे कई सफल सीईओ, उद्यमी, नेताओं से मैं मिला हूं।
डॉ. पटनायक का कहना था कि धर्म के नाम पर अब लेन-देन चल रहा है। यह पूरा कॉरपोरेट सिस्टम है। यहां यजमान निवेशक की भूमिका में है। वह निवेश की आहूति देता है। इसके बाद निवेश एजेंसी के रूप में देवता की तरफ से तथास्तु का रिटर्न भी चाहिए होता है। जिस देवता से तथास्तु का रिटर्न नहीं मिलता। वह देवता रूपी कंपनी ही बाहर हो जाती है।
वहीं देवता आज के समय में टिकते हैं जोकि निवेश के बाद रिटर्न दें। कम निवेश में रिटर्न अच्छा आए तो यह देवता और बेहतर माने जाते हैं। पूर्व में बनने वाले धार्मिक स्थल आसपास के लोगों को रोजगार भी देते थे। ऐसे में धर्म लोगों को पसंद आता था। अब नए धार्मिक स्थल खास लोगों को रोजगार नहीं देते, ऐसे में विवाद भी खड़ा रहता है।
हालात पर राम, कृष्ण किए जाते पसंद
डॉ. पटनायक का कहना था कि जब कॉरपोरेट में आने वाले प्रबंधक खुद को साबित करने की लड़ाई लड़ रहा होता है। ऐसे में बन बनाए नियम-कानून भी तोड़ने से नहीं हिचकिचाता। यहां कृष्ण उसको पसंद होते हैं। सफलता मिलते ही वही नियम कानून का प्रबंधन उसे जरूरी लगने लगता है। यहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम उसकी पसंद बन जाते हैं। यही कॉरपोरेट की सच्चाई हो गई है।