लखनऊ। किसी भी जीव की संरचना और व्यवहार में परिवर्तन को समझने के लिए बड़े डाटा सेट की जरूरत होती है। यह बात यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर यूके के प्रो. टॉम ट्रेगेंजा ने आम चहकने वाले झींगुरों पर किए गए अपने 20 वर्षों के अध्ययन डाटा पर चर्चा के दौरान कही। वह लखनऊ विवि के जंतुविज्ञान विभाग में आयोजित भारतीय विकासवादी जीव विज्ञानी समाज के पांचवें वार्षिक सम्मेलन में बोल रहे थे।
पहले दिन कार्यक्रम में 13 व्याख्यान हुए। इसमें अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों ने विचार व्यक्त किए। आईआईएसईआर कोलकाता की डॉ. अनिंदिता भद्रा ने आवारा कुत्तों के परिवारों और उनके आपस में सहयोग करने के तरीके के बारे में बात की। उन्होंने इन संबंधों को आकार देने में मानवीय अंतःक्रियाओं के प्रभाव के बारे में बात की।
डॉ. अमित त्रिपाठी ने मोनोजीनियन नामक मछली परजीवी कृमियों पर अपना डाटा प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया, कृमि मछली मत्स्य उद्योग के लिए गंभीर खतरा है। कार्यक्रम में प्रो. एचए रंगनाथ, डॉ. कृष्णमेघ कुंटे, डॉ. एनजी प्रसाद, डॉ. यशराज चव्हाण ने भी अपने कार्य से छात्र-छात्राओं का परिचित करवाया। कार्यक्रम की संयोजक प्रो. गीतांजलि मिश्रा रही। इसमें देशभर से दो सौ से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए।