फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'यूपी में लगातार बढ़े हैं दलितों के साथ अपराध'

विज्ञापन
विज्ञापन
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने यूपी में तेजी से बढ़ रहे दलित अपराधों पर नाराजगी जताई है। आयोग के अनुसार वर्ष 2012 में यूपी में दलित उत्पीड़न के 6427 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2014 में 9112 मामले दर्ज हुए हैं।
विज्ञापन


इनमें हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध भी शामिल हैं। इसके अलावा बहुत से मामलों में एफआईआर तक नहीं लिखी जा रही है। खुद सरकार ने माना है कि 1500 मामलों में कोर्ट के आदेश से प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।

आयोग ने बुधवार को आठ साल बाद यूपी की समीक्षा की। इससे पहले सितंबर 2007 में सूबे की समीक्षा की गई थी। हालांकि जून 2011 में भी आयोग यूपी आया था, लेकिन तब सरकार ने सूचना उपलब्ध नहीं कराई थी।
विज्ञापन


आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने बताया कि यूपी में दर्ज मामलों में 3276 में फैसला हुआ है। इनमें से 1772 में अपराधियों को सजा हुई है, जबकि 1504 बरी हुए हैं। न्यायालय में चल रहे वादों को स्पेशल कोर्ट में सुनवाई कर जल्द निपटाने के लिए कहा गया है।

उन्होंने कहा कि यूपी में दलितों की 21 फीसदी आबादी है, लेकिन बीपीएल परिवारों को देखा जाए तो उसका 33 फीसदी दलित परिवार हैं। दलितों के आर्थिक उत्थान के लिए सरकार को काम करना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा कि  जिलों में डीएम व एसपी सुबह 10 से 12 बजे तक दफ्तर में बैठकर समस्याएं जरूर सुनें।

योजना भवन में हुई समीक्षा में समाज कल्याण मंत्री व आला अफसरों के अलावा आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजकुमार वेरका, सदस्य राजू परमार, पीएम कमलम्मा व ईश्वर सिंह आदि मौजूद थे।

राज्य स्तरीय विजिलेंस कमेटी से सीएम नावाकिफ

दलितों पर हो रहे अपराधों पर निगरानी रखने के लिए हर जिले में विजिलेंस कमेटी बनी है, जबकि राज्य स्तर पर सीएम की अध्यक्षता में विजिलेंस कमेटी है। राज्य स्तरीय कमेटी को साल में दो बैठकें करनी होती हैं, लेकिन तीन जून 2011 के बाद से इसकी बैठक ही नहीं हुई।

आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने कहा कि मुख्यमंत्री से जब इस बारे में बात हुई तो उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने उन्हें इस समिति के बारे में बताया ही नहीं। जिले की कमेटी को भी हर तीन महीने में बैठक करनी होती है। इस लिहाज से सूबे के 75 जिलों में 300 बैठकें होनी चाहिए थीं, लेकिन वर्ष 2014 में 116 बैठकें ही हुई हैं।

आयोग ने समीक्षा में पाया कि दलितों के लिए आवंटित 14633 करोड़ रुपये में से 14283 करोड़ सामान्य कामों में खर्च कर दिए गए। आयोग का कहना था कि सभी पात्र छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप मिलनी चाहिए। छात्रों से दाखिले के लिए फीस नहीं ली जानी चाहिए। सरकार संस्थान को सीधे फीस का पैसा ट्रांसफर करे।
 
विज्ञापन

प्रमोशन में आरक्षण पर भी सरकार के रुख से असंतोष

आयोग ने प्रमोशन में आरक्षण के मसले पर सरकार के रुख से असंतोष जताया है। पुनिया ने बताया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से कहा गया है कि राज्य सरकार 1997 से पदोन्नति पाने वालों को रिवर्ट कर रही है।

जबकि एम. नागराज के केस में निर्णय वर्ष 2006 में आया था। ऐसे में सरकार से आरक्षण पर स्टडी कराने के लिए कहा गया है। मुख्यमंत्री इसके लिए टेक्निकल कमेटी बनाने को राजी हो गए हैं।
 
आयोग ने पाया कि सूबे में अब भी 1.5 लाख शुष्क शौचालय हैं, जबकि पांच हजार से अधिक कामगार इन्हें साफ करते हैं। सरकार को तत्काल इन शौचालयों को खत्म कर इनकी जगह पानी वाले शौचालय बनाने चाहिए। इसके लिए संबंधित लोगों को वन टाइम ग्रांट देनी चाहिए।
 
दलितों की जमीन बेचने के लिए डीएम की इजाजत खत्म करने संबंधी संशोधन का आयोग ने विरोध किया है। आयोग ने सरकार से पूछा है कि यह संशोधन किसके कहने पर किया जा रहा है। क्या दलितों ने इसकी मांग की थी?

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें