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यूपी: सख्ती लंबी खिंचने से अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा प्रतिकूल प्रभाव, स्वास्थ्यकर्मियों को बोझ समझने से भी बढ़ी मुश्किल

Mon, 26 Apr 2021 01:07 PM IST
ishwar ashish महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

वित्त वर्ष 2020-21 में कोरोना महामारी की वजह से राज्य के सारे बजट अनुमान गड़बड़ा गए थे। फिर भी सरकार ने कोरोना की पहली लहर से निपटने के बाद विजय भाव में वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में अर्थव्यवस्था व विकास की गुलाबी तस्वीर पेश की।
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विस्तार
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कोरोना कर्फ्यू, व्यापारियों के स्तर से स्वत: बंदी व कोविड प्रोटोकॉल के चलते लोगों के कम से कम बाहर निकलने का राज्य की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रभाव वित्त वर्ष 2020-21 जैसा घातक होने की आशंका अभी नजर नहीं आ रही है। पर, इस विपत्ति काल में सरकार को खर्च की प्राथमिकता का नए सिरे से निर्धारण जरूर करना होगा।

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वित्त वर्ष 2020-21 में कोरोना महामारी की वजह से राज्य के सारे बजट अनुमान गड़बड़ा गए थे। फिर भी सरकार ने कोरोना की पहली लहर से निपटने के बाद विजय भाव में वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में अर्थव्यवस्था व विकास की गुलाबी तस्वीर पेश की। पर इस वित्त वर्ष का पहला महीना शुरू हुआ कि कोरोना की दूसरी लहर आ गई। वहीं, संक्रमण इतना भयावह कि इससे निपटने की सारी तैयारी व अनुमान ध्वस्त साबित हो गए हैं।
 
राज्य सरकार सप्ताहांत लॉकडाउन लगा रही है तो व्यापारी अपने स्तर पर अलग-अलग दिन बंदी कर रहे हैं तो कई जगहों पर बाजार खुलने के समय में कटौती कर दी गई है। वहीं, आम लोगों ने भी घरों से निकलना लगभग बंद ही कर दिया है। क्लब, होटल और रेस्तरां सूने नजर आने लगे हैं। जबकि कोरोना की दूसरी लहर के पीक पर आने में अभी 20 दिन लगने का अनुमान है।
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इधर राज्य कर विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में यह सख्ती जारी रहने की संभावना है। यह सख्ती जितना लंबी खिंचेगी, अर्थव्यवस्था पर इसका उतना ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

पहली तिमाही का वार्षिक अनुमान पर भी होगा असर

आमतौर पर सहालग, नवरात्रि आदि मौकों पर बाजारों में खूब रौनक रहती है। लोग जमकर खरीदारी करते हैं। पर, कोरोना की दूसरी लहर इन्हीं आयोजन के बीच तेज हो गई। इससे पहले तय आयोजन, कारोबारी आर्डर रद्द किए जा रहे हैं। वहीं जहां आयोजन हो रहे हैं, वहां खर्च सीमित हो गया है। इसका असर वाहन, सराफा, गारमेंट, टेंट, होटल, हलवाई, फर्नीचर व स्थानीय बाजार पर पड़ना शुरू हो गया है। मई के अंत तक हालात सामान्य होने का अनुमान है। वित्त विभाग के विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर पहली तिमाही के दो माह असामान्य रहे तो इसका पूरी पहली तिमाही पर गंभीर नकारात्मक असर हो सकता है। इसका वार्षिक अनुमान पर भी असर पड़ेगा।

चुनाव का खर्च सीमित होने से बाजार भी प्रभावित
चुनाव भी खर्च का एक बड़ा मौका होता है। आचार संहिता व बंदिशों के बावजूद मानक से कई गुना खर्च हो जाता है। पर कोरोना की वजह से प्रचार सभाओं की न के बराबर अनुमति, 5 से ज्यादा लोगों के जुटने पर पाबंदी, एक साथ चार चुनाव की वजह से भी यह खर्च अनुमान से बहुत कम पर सिमट गया है। पंचायत चुनाव में पर्दे के पीछे मतदाताओं में पैसे भी खूब बंटते रहे हैं। जबकि इस बार अब तक छिटपुट घटनाएं ही पकड़ में आई हैं। ऐसे में चुनाव का खर्च सीमित हो गया है। बाजार भी प्रभावित हो रही है।
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राज्य की प्राथमिकताओं का समय से निर्धारण न होने से ये हालात

अर्थशास्त्री प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में जो स्थिति देखने को मिल रही है, उसकी मुख्य वजह लंबे समय से राज्य की प्राथमिकताओं को सही ढंग से निर्धारण न होना है। दिसंबर-2015 में यूपी इकोनॉमिक एसोसिएशन की एक कॉन्फ्रेंस में यूपी की जनसंख्या 1991 की तुलना में 2021 में लगभग दोगुनी होने का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया था। साथ ही 1991 के स्तर को बनाए रखने के लिए दोगुनी विकास की आवश्यकताओं की जरूरत बताई गई थी।

ऐसा न होने पर बड़े पैमाने पर अव्यवस्था फैलने की भविष्यवाणी की गई थी। पूर्व के वर्षों में इन निष्कर्षों पर ध्यान देकर राज्य की प्राथमिकताएं तय नहीं की गईं। हालांकि कुछ वर्षों में स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की कुछ कोशिश हुई, लेकिन अभी भी यह सामान्य आवश्यकता के अनुपात में बहुत कम है। फिर जब चुनौती महामारी की है, तब यह नीतिगत उपेक्षा अनुमान की तरह ही भारी पड़ रही है।

दूसरा, कई वर्षों से महसूस किया जा रहा है कि राज्य नियमित सरकारी कर्मचारियों को बोझ के रूप में देखने लगा है। स्वास्थ्य, शिक्षा व राजस्व प्रशासन में जिस तरह संविदा व आउटसोर्सिंग का प्रयोग हुआ, वह बेहद घातक है।

ये सेक्टर ऐसे हैं, जहां पूरा सिस्टम नियमित होना चाहिए। न सिर्फ बढ़ती आवश्यकताओं के हिसाब से पद बढ़ाने चाहिए बल्कि समय से पद भरने की कार्यवाही भी होनी चाहिए। पर ऐसा नहीं किया गया। आज महामारी के समय में यही सरकारी मुलाजिम सबसे बड़ी कुर्बानी दे रहा है। डॉक्टर, फार्मासिस्ट से लेकर नर्स, वार्ड बॉय व राजस्व लेखपाल तक के हजारों पद खाली हैं।
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