सुशांत गोल्फ सिटी दयालबाग में आयोजित महफिल ए दयाल कार्यक्रम मैं पंकज उधास अपने गजल प्रस्तुत करत?
- फोटो : LKO CITY
लखनऊ। निकलो ना बेनकाब....., थोड़ी-थोड़ी पिया करो...., चिट्ठी आई है आई है.... जैसी गजलें गाकर गजल गायिकी को एक नई पहचान, एक नया मुकाम देेने वाले पंकज उधास शुक्रवार को राजधानी में थे। एक लंबे अंतराल के बाद लखनऊ आए पंकज अपने साथ गजल प्रेमियों के लिए मौशीकी का वही खजाना लेकर आए थे। कार्यक्रम से पहले स्थानीय होटल में लखनवी मीडिया से रूबरू हुए पंकज उधास ने रवीन्द्रालय में सजी महफिल, लॉकडाउन लगते ही अमेरिका से वापसी और लखनऊ आने तक के किस्से साझा किए।
गजल को प्रसिद्ध बनाने में फिल्मों का बड़ा हाथ
पूछे गए सवाल के जवाब में पंकज ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि गजल को प्रसिद्ध बनाने में फिल्मों का बड़ा हाथ हैं। मैंने खुद कई गजलें गाईं और गजल प्रेमियों ने बहुत प्यार दिया।
कद्रदानों की संख्या कम नहीं हुई
सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि कन्सर्ट तो बदलते वक्त का दौर है, लेकिन गजलों के कद्रदानों की संख्या कम नहीं हुई है। गीत-संगीत सुनने वालों में 60 फीसदी ऐसे लोग हैं जो दिल को छूने वाला गीत-गजल सुनना चाहते हैं। दिल्ली का एक ऑडिटोरियम आज भी फुल रहता है, गजलों की महफिल के दौरान। उन्होंने कहा कि पहले आठ लोगों की टीम एक गीत पर काम करती थी, आज अकेला व्यक्ति सिंगर बनना चाहता है। यही वजह है कि गजलें, कव्वाली कम होती जा रही हैं।
वो दौर आज भी याद आता है
पंकज उधास ने कहा कि लखनऊ से रिश्ता बहुत गहरा है। मुझे याद है कि रवींद्रालय में कार्यक्रम था। श्रोताओं की संख्या इतनी थी कि बैठने की जगह नहीं थी। उस दौरान मुझे याद है कि बवाल हो गया था।
लॉकडाउन के बाद पहला कार्यक्रम आपके शहर में
पंकज उधास ने कहा कि मुझे याद है कि 2020 की फरवरी में अमेरिका में आयोजन था। लॉकडाउन लग गया, आधा कार्यक्रम छोड़ कर आना पड़ा। इसके बाद पहला कार्यक्रम लखनऊ में करने आया हूं। यह इस शहर से, यहां के लोगों से मोहब्बत ही तो है।