घोषित तौर पर सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष, पर अंदरखाने विकल्पहीनता के कारण मजबूरी का सौदा। कुल मिलाकर यूपी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की यही स्थिति है। पार्टी के वरिष्ठ नेता भी कहते हैं-बसपा को समर्थन न करते तो क्या करते।
यूपी में पार्टी अपना एक भी प्रत्याशी जिताने की स्थिति में नहीं है। सपा के अलावा कोई भी विपक्षी पार्टी जीत के जादुई ‘37’ के आंकड़े से कोसों दूर है। अब ऐसे में अगर कांग्रेस बसपा को समर्थन नहीं देती तो ज्यादा संभावना इस बात की थी कि उसके कई वोट भाजपा के पक्ष में चले जाते। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में अब भी उसके 1-2 वोट सत्ताधारी दल को मिलने की चर्चा है। यही वजह है कि भाजपा पर्याप्त वोट न होने पर भी नवें प्रत्याशी पर दांव लगाने की योजना बना रही है।
बसपा सुप्रीमो मायावती के इस बयान ने कि राज्यसभा चुनाव में वे कांग्रेस के साथ ‘एक हाथ ले और दूसरे हाथ दे’ की नीति पर चलने के लिए तैयार है, कांग्रेस को इस निर्णय में फायदा दिखा। मसलन, अगर कांग्रेस यूपी में उनके प्रत्याशी का समर्थन करती है तो बसपा के विधायक मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करेंगे। इन स्थितियों में कांग्रेस हाईकमान ने बसपा को समर्थन देने का फैसला विधानमंडल दल के नेता अजय कुमार लल्लू को सुनाया। चूंकि राष्ट्रीय स्तर पर इससे बसपा के साथ गठबंधन का कोई स्पष्ट संदेश न जाए, इसलिए प्रस्ताव लल्लू की ओर से रखवाया गया।