सपा-बसपा को लगता है कि कांग्रेस का यूपी में निजी वोट बैंक नहीं है। अगड़ों और पिछड़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ है। मुस्लिम भी कांग्रेस में दिलचस्पी नहीं ले रहे। पिछले विस चुनाव में 6.2 फीसदी वोट पाने वाली कांग्रेस में अपने वोट किसी दूसरी पार्टी के पक्ष में मोड़ने की क्षमता भी नहीं है।
वरिष्ठ बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा का कहना है, ‘यूपी में सीटों के बंटवारे के फाइनल होने की जो खबरें चल रही हैं, वे गलत हैं। जब यह तय हो जाएगा तो मीडिया को इसकी जानकारी दी जाएगी।’
वहीं, सपा के राष्ट्रीय सचिव व मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है, ‘अभी गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन भाजपा को रोकने के लिए यूपी में सपा व बसपा मिलकर चुनाव लड़ेंगे। राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस पर फैसला लेंगे।’
यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि यूपी में कांग्रेस को अलग रखकर सपा, बसपा व रालोद गठबंधन भाजपा की राह रोकने में कितना कामयाब होगा? लेकिन परिस्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो दोनों के सामने इसके अलावा दूसरा रास्ता नहीं था।
मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बावजूद यदि सपा और बसपा दोनों प्रदेश में कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना चाहते हैं तो उसकी वजहें हैं।
दरअसल, सपा हो या बसपा दोनों को प्रदेश में कांग्रेस के साथ का बहुत सियासी लाभ का नहीं दिखता। राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो इसकी वजह प्रदेश के राजनीतिक समीकरण और जातीय गणित है। सपा और बसपा दोनों को लगता है कि तीन राज्यों में जीत के बावजूद यूपी में कांग्रेस का खुद का निजी वोट बैंक नहीं है।
दूसरी एक और वजह भी नजर आ रही है। राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार, सपा एवं बसपा को यह डर भी सता रहा है कि कांग्रेस को साथ रखने से कहीं ऐसा न हो कि इनका वोट तो उसे सियासी लाभ पहुंचा दे। पर, कांग्रेस के हाथ का हाथी या साइकिल को कोई लाभ न मिले। फिर दोनों पार्टियों को एक भय यह भी है कि सियासी लड़ाई में यदि कांग्रेस का ग्राफ बढ़ा तो भविष्य में सियासी संघर्ष भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमट सकता है।