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भाजपा नहीं कांग्रेस ने शुरू की थी भगवा सियासत

Tue, 25 Mar 2014 01:51 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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भगवा टोली की बात आते ही आज भले ही लोगों के दिमाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ, हिंदू महासभा या भाजपा घूमने लगती हो, पर सियासत में भगवा चोले का प्रयोग सबसे पहले कांग्रेस ने यूपी में किया।
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मंदिर आंदोलन से बने माहौल में भाजपा ने इसे परवान चढ़ाया। साधु-संतों के सहारे सत्ता का सफर आसान बनाने के उपाय तलाशे। पर, धीरे-धीरे ये भगवा चेहरे भारी पड़ने लगे।

साधुओं पर सियासत का लबादा लोगों में ऊब पैदा करने लगा तो भाजपा ने भी इनसे किनारा करना शुरू कर दिया। पर, संत हैं कि सियासत छोड़ना नहीं चाहते।

नतीजा यह हुआ कि सियासत को लेकर अब साधु-संतों व भाजपा के बीच ही जंग छिड़ गई है।

कांग्रेस ने इन साधुओं से की थी सियासत

वरिष्ठ पत्रकार आनंद मिश्र अभय कहते हैं कि पहले आम चुनाव में कांग्रेस ने हैदराबाद की स्वामी रामानंद पीठ के स्वामी रामानंद को‌ टिकट दिया था।

इसी तरह, उत्तर प्रदेश में बरहज (देवरिया) के संत बाबा राघवदास को फैजाबाद से आचार्य नरेन्द्र देव के विरुद्ध मैदान में उतारकर साधु-संत के सहारे सियासत में बाजी मारने का प्रयोग किया।

हालांकि भाजपा ने इस बार भी भगवा चेहरों साध्वी उमा भारती, साध्वी निरंजन ज्योति, सावित्री फुले व साक्षी महराज को क्रमश: झांसी, फतेहपुर, बहराइच व उन्नाव से चुनाव मैदान में उतारा है।

लेकिन, टिकट न मिलने से डॉ. रामविलास वेदांती रूठे हुए हैं तो चिन्मयानंद भी नाराज हो गए हैं।

दूसरों ने भी अपनाया यही फंडा

कांग्रेस की देखादेखी दूसरी पार्टियों ने भी यह प्रयोग किया। खुद बाबा राघवदास ने कहा कि आचार्य नरेन्द्र देव भी राजनीति के बड़े संत हैं।

अगर पार्टी अनुशासन की बात न होती तो ऐसे संत के खिलाफ चुनाव न लड़ता। मिश्र की बात पर आज साधुओं की सियासत को कसें तो बड़ा बदलाव दिखता है।

समय बदलने के साथ संतों के लिए सियासत के मायने बदल गए। पहले सियासी दल संतों के सहारे सियासत में सफलता और सत्ता पाने का सपना देखते थे।

आज साधु सियासत के सहारे अपना परचम फहराना चाहते हैं। इसी चक्कर में सिर्फ एक गोरक्षपीठ को छोड़कर अन्य सभी की पकड़ व पैठ कमजोर पड़ती दिख रही है।

मंदिर लहर में भाजपा पर चढ़ा भगवा रंग

वर्ष 1991 के चुनाव में मंदिर मुद्दे की लहर पर सवार भाजपा ने अपने ऊपर ऐसा भगवा चटक रंग चढ़ाया कि साधु-संत और भाजपा एक-दूसरे के पर्याय माने जाने लगे।

साधुओं की इस भागीदारी का भाजपा ने राजनीतिक लाभ भी खूब उठाया।

धार्मिक प्रवचन करने वाले स्वामी चिन्मयानंद को बदायूं से, संत विश्वनाथ दास शास्त्री को सुल्तानपुर से, स्वामी सुरेशानंद को जलेसर से तथा सच्चिदानंद साक्षी महाराज को मथुरा से उतारा गया और सभी जीत भी गए।

पर, 1996 के चुनाव में इनमें से कुछ के बारे में अच्छा फीडबैक न मिलने के कारण साक्षी महाराज को मथुरा के बजाय फर्रुखाबाद से, चिन्मयानंद को बदायूं के बजाय शाहजहांपुर से लड़ाया गया।

मंदिर आंदोलन ने दिलाई धड़ाधड़ जीत

मंदिर आंदोलन के प्रमुख लोगों में शामिल डॉ. रामविलास वेदांती को पहली बार मछलीशहर से लड़ाया गया। साक्षी तो जीत गए लेकिन चिन्मयानंद तीसरे नंबर पर रहे।

वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में चिन्मयानंद ने फिर क्षेत्र बदला और पहुंच गए वेदांती के क्षेत्र मछलीशहर। वेदांती को बगल की सीट प्रतापगढ़ पर कांग्रेस की राजकुमारी रत्ना सिंह के खिलाफ उतारा गया। वेदांती और चिन्मयानंद दोनों जीत गए।

वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में चिन्मयानंद को फिर सीट बदलने की जरूरत सताई। साक्षी को भाजपा जिताऊ नहीं लगी तो उन्होंने कल्याण सिंह के साथ पार्टी से किनारा कर लिया।

वेदांती को प्रतापगढ़ से बदलकर फिर पुरानी सीट मछली शहर में लाया गया। पर, वह हार गए। चिन्मयानंद को क्षेत्र बदलने का फायदा मिला। वह जीत गए।
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योगी छोड़ सबने खोया तेज

आज गोरखपुर की गोरक्ष पीठ को छोड़ सभी ने अपना तेज गवां दिया है। पीठ के महंत दिग्विजय नाथ हों, उनके बाद महंत अवैद्यनाथ और उनके उत्तराधिकारी व मौजूदा सांसद योगी आदित्यनाथ को छोड़ राजनीति में स्थायी ठौर कोई नहीं बना पाया।

महंत अवैद्यनाथ सन 1962 और 70 में जहां विधायक रहे, वहीं 1989 में गोरखपुर से ही हिंदू महासभा केटिकट पर सांसद चुने गए। बाद में भाजपा ने आग्रह करके उन्हें अपने साथ ले लिया।

वह 1991 व 96 में गोरखपुर से भाजपा के सांसद चुने गए। इसके बाद उनके उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ 1998, 99, 2004 और 2009 के चुनावों में भाजपा के टिकट पर सांसद चुने जा चुके हैं।

भाजपा ने योगी के साथ 2004 के चुनाव में वेदांती व चिन्मयानंद को क्रमश: अमेठी व जौनपुर से चुनाव लड़ाया। पर, ये दोनों लोग सफल नहीं हो पाए।

नतीजतन 2009 में भाजपा ने साधुओं की सियासत से ही तौबा कर लिया। पर, इस बार भगवा रणनीतिकारों ने फिर उसी ओर कदम बढ़ाया है। पर, साधु हैं कि चार चेहरों की भागीदारी से संतुष्ट होने को तैयार नहीं।
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