लंबी जद्दोजहद के बाद भाजपा और अपना दल का चुनावी गठबंधन आखिरकार हो ही गया।
इसके तहत अपना दल मिर्जापुर व प्रतापगढ़ में ही लड़ेगा, पर असली फायदा तो भाजपा को मिलेगा क्योंकि माना जाता है कि प्रदेश की 40 सीटों पर कुर्मी मतदाताओं की संख्या 5 से 15 फीसदी के बीच है।
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी खुद जिस बनारस सीट से लड़ रहे हैं, वहां कुर्मी मतदाताओं की संख्या सवा दो लाख से अधिक मानी जाती है।
गठबंधन इसलिए भी संभव हो सका कि भाजपा मोदी की तमाम हवा के बावजूद उनकी सीट पर किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती थी।
भाजपा को करनी पड़ी मशक्कत
दरअसल बनारस से मोदी के चुनाव लड़ने के फैसले के साथ भाजपा नेतृत्व ने जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने के लिए अपना दल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
करीब एक महीने पहले बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, पर कई दौर की बातचीत के बाद भी बात नहीं बन पा रही थी।
क्योंकि अपना दल तीन सीटों (प्रतापगढ़, मिर्जापुर व फूलपुर) से कम पर तैयार नहीं था और भाजपा एक सीट से ज्यादा देना नहीं चाहती थी।
खींचतान के बीच बातचीत का सिलसिला भी कमजोर पड़ने लगा।
अपना दल की डिमांड वाली सीटों खास तौर से मिर्जापुर व प्रतापगढ़ के स्थानीय भाजपा नेता भी इस गठबंधन का विरोध करने लगे। गठबंधन के परवान चढ़ने पर भी सवाल उठने लगे।
फिर अनुप्रिया ने दिया अल्टीमेटम
इसी बीच दल की महासचिव अनुप्रिया पटेल ने दबाव की रणनीति अपनाते हुए अल्टीमेटम दिया कि अगर 24 मार्च तक बात फाइनल न हुई तो वह मोदी के खिलाफ बनारस में चुनाव लड़ेंगी।
इस पर भाजपा नेतृत्व एक बार फिर सक्रिय हुआ और कोई अड़ियल रुख न अपनाते हुए दो सीटें देकर अपना दल से हाथ मिला लिया।
पिछड़ों में शुमार कुर्मी बिरादरी के मतदाताओं की संख्या चार फीसदी से कुछ अधिक मानी जाती है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में इनका राजनीतिक झुकाव अलग-अलग दलों के साथ रहता है।
बुंदेलखंड में अधिकांश कुर्मी बसपा के समर्थक माने जाते हैं तो पूर्वांचल व रुहेलखंड में भाजपा की ओर इनका झुकाव रहता है।
कानपुर, वाराणसी में मिली अच्छी जीत
अवध क्षेत्र में कुर्मी वोट सपा व कांग्रेस के बीच बंटता रहा है।
इस बीच कुर्मी स्वाभिमान के नाम पर अस्तित्व में आए अपना दल ने राजनीतिक तौर से अलग-थलग पड़े कुर्मियों को अपने साथ से जोड़ने की कोशिश की।
संस्थापक सोनेलाल पटेल की आकस्मिक मौत के बाद नए सिरे से सक्रिय हुए अपना दल ने पिछला चुनाव जोर-शोर से लड़ा था, पर स्वीकार्यता बनारस व कानपुर के आसपास के क्षेत्रों में ज्यादा मिली।
दल की एकमात्र विधायक व राष्ट्रीय महासचिव अनुप्रिया पटेल बनारस की रोहनियां सीट से विधायक बनीं। हालांकि शहर की सेवापुरी सहित अन्य सीटों पर भी उन्हें अच्छे वोट मिले।
शायद यही कारण था कि बनारस से मोदी को चुनाव लड़ाने वाली भाजपा ने उससे दोस्ती करना ही मुनासिब समझा और अंततोगत्वा कामयाब भी हुई।
असंतोष के सुर भी
अपना दल व भाजपा के तालमेल को लेकर मिर्जापुर व प्रतापगढ़ के भाजपाइयों में बहुत रोष है।
मिर्जापुर से भाजपा के टिकट के प्रबल दावेदार व वरिष्ठ भाजपा नेता ओमप्रकाश सिंह के बेटे अनुराग सिंह ने कहा कि वह इस फैसले के खिलाफ मंगलवार को मिर्जापुर में अपने समर्थकों व क्षेत्र की जनता के साथ एक बड़ी बैठक कर रहे हैं।
जनता की जो राय होगी, वह मुझे स्वीकार होगी। गौरतलब है कि मिर्जापुर में पूर्व में इस संभावित तालमेल को लेकर विरोध हो चुका है।
वहीं प्रतापगढ़ से भाजपा टिकट के दावेदार पूर्व विधायक मोती सिंह ने कहा कि उन्हें इस गठबंधन से असंतोष है।
इसकी कोई जरूरत नहीं थी। जहां तक बनारस सीट की बात है, नरेंद्र मोदी इतने लोकप्रिय हैं कि उनकी बिना किसी अन्य दल की मदद से भारी जीत होती।