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बाल संरक्षण गृह में बच्चों से गुलामों जैसा व्यवहार, नशीली दवाओं की सप्लाई तक के आरोप लगे

Tue, 07 Aug 2018 03:27 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala
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मुजफ्फरपुर के बाद देवरिया में सामने आए बालिका गृह यौन शोषण मामले से लोगों में गुस्सा है। राजधानी लखनऊ के बालिका गृहों की बात करें तो यहां भी अनियमितताओं के आरोप लड़कियां लगा चुकी हैं। बाल गृहों व संप्रेक्षण गृहों में लड़कों के साथ जुल्म और शोषण के कई मामले भी सामने आ चुके हैं। हाल में आए कुछ प्रमुख मामलों का लेखा जोखा -

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दो साल में चार लड़कियां भागीं, आज तक नहीं मिलीं : राजकीय बालगृह (बालिका) मोती नगर
- यहां दिसंबर 2017 से दो लड़कियां भाग निकलीं और पुलिस को देर से सूचित किया गया। हालांकि आज तक इनका पता नहीं चला है।

- अक्तूबर 2017 में भी दो लड़कियां भाग गईं थीं, इन्हें भी आज तक तलाशा नहीं जा सका। दोनों ही मामलों में लड़कियों के भागने को संदेहास्पद माना जा रहा है क्योंकि बाल गृह स्टाफ ने पुलिस को देर से सूचित किया।

- 2016 में उप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष जूही सिंह व सदस्यों ने यहां छापा मारा। इसमें सामने आया कि यहां का स्टाफ लड़कियों के लिए आने वाली रोजमर्रा की जरूरत की चीजों से लेकर खाने-पीने की वस्तुओं तक को अपने घर ले जाता है।

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बड़ी उम्र के किशोरों का छोटों से गुलामों जैसा व्यवहार : राजकीय बाल गृह (किशोर), मोहान रोड

- यहां 12 से 18 वर्ष तक के किशोरों को रखा जाता है। लेकिन यहां कई 20 वर्ष की उम्र तक के हैं। इनका छोटों का शोषण करने, अपने काम करवाने और गुलामों जैसे व्यवहार करने की शिकायतें कई बार बच्चों ने बाल आयोग व डीपीओ के दौरों में की, पर कार्रवाई नहीं हुई।

- यहां कई बाल श्रमिकों को रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद शरण दिलाई जाती है। उनसे मिलने आए अभिभावकों से स्टाफ के रिश्वत मांगने के आरोप लगते हैं।

दत्तक गृह के बच्चे बेचने के आरोप लगे : लीलावती मुंशी बालगृह, मोती नगर
- इस निजी बाल गृह में 80 से 100 बच्चे रखे जाते हैं। अधीक्षिका माया हंस के मुताबिक यहां सरकारी नियमों के तहत बच्चों को शिक्षित व रोजगार से जोड़ने का काम किया जा रहा है।

- इसी बाल गृह पर दत्तक गृह के बच्चों को बेचने के आरोप लग चुका है। इसकी जांच उच्च स्तर से करवाने की जरूरत बाल अधिकार विशेषज्ञ बताते हैं।

बच्चों को नशीली दवाएं तक सप्लाई : राजकीय संप्रेक्षण गृह, मोहान रोड

प्रतीकात्मक तस्वीर
- इस बाल गृह में जेजे एक्ट के तहत कानून के विरुद्ध गतिविधियों में लिप्त पाए किशोरों को रखा जाता है।

- यहां से 2017 में आठ किशोर भाग चुके हैं। उस समय 60 बच्चों की क्षमता के बावजूद यहां चार जिलों के 130 बच्चों व किशोरों को रखा गया था। कार्रवाई के नाम पर केवल संप्रेक्षण गृह के अधीक्षक का तबादला हुआ।

- जिला प्रशासन के नवंबर 2017 में मारे छापे में कम उम्र के किशोरों ने शिकायत दी कि यहां स्टाफ नशीली दवाएं मुहैया करवाता है। कुछ बड़ी उम्र के किशोरों द्वारा यौन शोषण के आरोप भी लगे, जिनकी कभी विस्तृत जांच नहीं की गई।

नहीं खुला नवजात की मौत का राज : राजकीय बाल गृह (शिशु), प्राग नारायण रोड

प्रतीकात्मक तस्वीर
- दिसंबर 2016 में यहां से चार बच्चे छत से कूद कर भागे थे। इनमें से दो रेलवे स्टेशन से बरामद हुए, लेकिन बाकियों का कोई सुराग नहीं मिला। बरामद बच्चों ने बताया कि उन्हें स्टाफ व अधीक्षक पीटते थे।

- कार्रवाई के नाम पर जांच हुई और संविदा कर्मचारियों का दूसरे बाल गृह में स्थानांतरण कर दिया गया।

- लेकिन ज्यादा गंभीर मामले बच्चों की मौतों के थे। 2017 में यहां शरण दिलाए गए एक नवजात बच्चे के पैर में संक्रमण हुआ जिसकी बाद में झलकारी में मौत हो गई। बच्चे का पैर स्टाफ की लापरवाही से प्रेस से जला था। हालांकि कर्मचारियों की सख्त जांच नहीं हुई, इसलिए मौत का राज नहीं खुल सका।

मां से छीनकर बच्चा बेचना साबित हुआ : श्रीराम औद्योगिक अनाथालय, अलीगंज

प्रतीकात्मक तस्वीर
- निजी हाथों में रहे 100 से अधिक वर्ष पुराने इसे अनाथालय से 2013 में बच्चे जयपुर के दंपती को गोद दिलवाया गया। उस समय अधीक्षिका रुचि त्रिपाठी थी। बाद में सामने आया कि उस बच्चे की मां निशा जीवित थी और उससे जबरन वह बच्चा लिया गया था। बच्चे के लिए निशा हाईकोर्ट तक लड़ी, डीएनए टेस्ट करवाए गए, जिसमें साबित हुआ कि बच्चा उसी का ही है। लेकिन उस समय भी बच्चा निशा को वापस नहीं मिला, मुकदमे में दूसरा पक्ष आगे की तारीखें लेता चला गया।

- एक्शन के नाम पर केवल अनाथालय में बाल कल्याण समिति ने लावारिस बच्चों को शरण दिलाना बंद कर दिया। प्रशासन ने मान्यता खत्म की और निजाम बदला गया।

- फिलहाल 35 बच्चे हैं, नए संचालकों के सुधार कार्यों के बाद वापस यहां लावारिस बच्चों को शरण दिलाई जाने लगी है।
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‘सरकारी बालगृहों का स्टाफ सहयोग नहीं करता’

प्रतीकात्मक तस्वीर
शहर के बच्चों के हितों के संरक्षण की पहली न्यायिक संस्थान बाल कल्याण समिति को माना जाता है। इसके अध्यक्ष कुलदीप रंजन ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में माना कि बालगृहों में बच्चों की सुरक्षा की अनदेखी हो रही है। समिति ने इस पर कार्रवाई भी की है।

वहीं सरकारी बालगृह लावारिस और जरूरतमंद बच्चों को शरण दिलाने के दौरान राजकीय बालगृह स्टाफ ज्यादा असहयोग करता है। जबकि प्राइवेट बालगृहों में बच्चों को शरण दिलाना आसान है।
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