लखनऊ। चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष के मुताबिक, सामुदायिक सहभागिता से ही टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल हो सकता है। हमें एकजुट होकर हर टीबी मरीज की समय पर पहचान और नियमित उपचार सुनिश्चित करना होगा। अपर मुख्य सचिव सोमवार को दो दिवसीय उत्तर क्षेत्रीय कार्यशाला के शुभारंभ पर बोल रहे थे।
कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड तथा उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सेंट्रल टीबी डिवीजन की उप महानिदेशक डॉ. उर्वशी बी सिंह ने बताया कि देश में सक्रिय केस खोज, टीबी के 10 प्रमुख लक्षणों पर आधारित शीघ्र पहचान और प्रभावी दवाओं से अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। इस मौके पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं के महानिदेशक डॉ. रतन पाल सिंह सुमन, सेंट्रल टीबी डिवीजन के संयुक्त आयुक्त डॉ. संजय मट्टू मौजूद रहे।
जोखिम वाली आबादी बरते अतिरिक्त सावधानी
प्रदेश के राज्य क्षय रोग अधिकारी और अपर निदेशक डॉ. शैलेंद्र भटनागर ने बताया कि उच्च जोखिम वाली जनसंख्या को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। इसमें 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग, कुपोषित जनसंख्या, धूम्रपान करने वाले, शराब एवं नशा करने वाले, इलाज करा रहे टीबी रोगियों के साथ रहने वाले, इलाज पूरा कर चुके व्यक्ति, एचआईवी ग्रसित व्यक्ति, वृद्धाश्रम और निर्माणाधीन भवन ईंट-भट्ठे, कारागार, मलिन बस्ती उच्च जोखिम वाले हैं इसलिए इस आबादी को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
टीबी के लक्षण
खांसी, बुखार, भूख न लगना, वजन कम होना, रात में पसीना आना, मुंह से खून आना, थकान, सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द और गर्दन में गिल्टी या गांठें।