यह देश की भौगोलिक सीमाओं में कृषि उत्पादन एवं बागवानी को छोड़कर शेष उन सभी उद्यमों व इकाइयों की गणना है जो वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन या वितरण के काम में लगी है।
महत्व : आर्थिक विकास को स्थायी गति व दिशा देने, योजनाओं को वैज्ञानिक आधार पर बनाने, राज्य की आय के आकलन, सरकारी तथा निजी क्षेत्र के नए उद्यमियों के लिए समुचित नीति निर्धारण और विकास कार्यक्रमों में आर्थिक गणना का महत्वपूर्ण योगदान है।
1977 में पहली बार आर्थिक गणना
भारत में पहली बार 1977 में आर्थिक गणना की गई थी। इसके बाद तय हुआ कि हर पांच वर्ष में कराई जाए। लेकिन 1981, 1991, 1998, 2005 और 2012 में कराई जा सकी।