अखिलेश यादव व राहुल गांधी की सियासी जुगलबंदी सपा-कांग्रेस दोनों के लिए फायदेमंद भले ही नजर आ रही हो, पर दोनों पार्टियों के लिए चुनौतियां भी कम नहीं है।
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सपा-कांग्रेस ने गठजोड़ करके विरोधी पार्टियों पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की दिशा में कदम तो बढ़ाया है लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि दोनों पूरे चुनाव में कितना कदमताल मिलाकर चल पाते हैं।
इतना तो तय हो गया है कि इस बार विधानसभा चुनाव में सत्ता की दौड़ में शामिल दलों के बीच मुकाबला बेहद रोचक होगा। सपा और कांग्रेस अगर अपना-अपना वोट बैंक एक दूसरे को ट्रांसफर कराने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर गठबंधन फायदे में रहेगा।
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हालांकि, यह बहुत आसान भी नहीं होगा। सपा में पिछले कुछ महीनों में चला घटनाक्रम और मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह का चुनावी सियासी नक्शे से गायब होना कोई न कोई गुल खिला सकता है।
अच्छी 'केमेस्ट्री' होने का दिया संदेश
सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन के औपचारिक एलान के एक सप्ताह बाद रविवार को लखनऊ में राहुल गांधी और अखिलेश यादव कंधे से कंधे से मिलाकर न सिर्फ खड़े हुए बल्कि दोनों के बीच अच्छी ‘केमेस्ट्री’ होने का संदेश देने की भी कोशिश की।
दोनों गर्मजोशी से मिले, एक दूसरे की तारीफ करने में भी पीछे नहीं रहे। चूंकि गठबंधन का पूरा फोकस यूथ पर है और राहुल व अखिलेश ने इसी वर्ग को टारगेट करते हुए राजधानी में साझा सियासी शो करके संदेश देने की पहल की है।
गठबंधन से मुख्य मुकाबले में आई सपा-कांग्रेस
सियासी जानकारों का मानना है कि सपा और कांग्रेस जहां मुख्य मुकाबले में नहीं थीं, गठबधन के बाद वहां भी चुनावी सीन में नजर आने लगेंगी। कहीं मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हुआ तो गठबंधन के हाथ जीत भी लग सकती है।
सपा: मुस्लिम वोटर दिखा सकते हैं भरोसा
अखिलेश यादव अपने काम के बूते चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं लेकिन उनके सामने प्रदेश में अपने मुस्लिम वोटबैंक को सहेजे रखने की चुनौती थी। दरअसल बसपा ने 100 मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर दलित-मुस्लिम समीकरण का दांव चला है।
दादरी और मुजफ्फरनगर दंगों सहित प्रदेश में हुए कई दंगों की वजह से भी मुस्लिम वोटर सपा को लेकर ऊहापोह में है। मुस्लिम वोटबैंक पर बसपा का दावा कमजोर करने में कांग्रेस का साथ सपा के लिए कारगर साबित हो सकता है।
इसके अलावा गठबंधन से सपा को कांग्रेस के परंपरागत सवर्ण मतदाताओं का समर्थन मिलने भी उम्मीद है। इससे उसके वोट प्रतिशत का ग्राफ बढ़ सकता है। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के साथ अखिलेश और डिंपल की जोड़ी युवाओं का रुख गठबंधन की तरफ मोड़ सकती है।
गठबंधन से कांग्रेस को संजीवनी मिलने की उम्मीद
- फोटो : amar ujala
यूपी में 27 साल से सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस के लिए अखिलेश यादव की विकास वाली छवि को भुनाने का पूरा मौका है। वैसे ही जैसे बिहार में नीतीश के बलबूते 4 से 27 सीटों पर जा पहुंची। यूपी में कांग्रेस की सियासी जमीन खिसक चुकी है। अकेले उतरने पर उसे और ज्यादा नुकसान का अंदेशा था।
गठबंधन के बाद थोड़े भी अच्छे प्रदर्शन से उसे संजीवनी मिल जाएगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि गठबंधन से कांग्रेस की सीटें बढ़ जाती हैं तो उसे दलित-मुस्लिम वोट बैंक फिर से सहेजने में मदद मिल सकती है। साथ ही 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस को प्रदेश में जमीन तैयार करने में मदद मिलेगी।
...मगर चुनौतियां भी हजार
सपा व कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बनाए रखने की होगी। अगर निचले स्तर पर दोनों के नेताओं व कार्यकर्ताओं में बेहतर केमेस्ट्री न बन सकी तो इसका नुकसान भी हो सकता है।
बिना इसके दोनों दलों के उम्मीदवारों का एक दूसरे का वोट ट्रांसफर होने की उम्मीद नहीं है। प्रचार अभियान में भी दोनों दलों के बीच आपस में तालमेल बिठाना बड़ी चुनौती है।
सीटों पर भी फंसा है पेंच
सपा ने 105 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी हैं। अमेठी और रायबरेली की सीटों को लेकर गतिरोध अभी कायम है। कांग्रेस दोनों संसदीय क्षेत्रों की सभी 10 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करना चाहती है जबकि सपा ने कई सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। सीटों को लेकर फंसे पेंच को दूर करना दोनों के लिए कम बड़ी चुनौती नहीं है।
मुलायम और शिवपाल फैक्टर भी डालेगा असर
मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
भले ही सपा पर अखिलेश का एकाधिकार हो गया हो पर जिस तरह मुलायम व शिवपाल चुनावी सीन से गायब हैं उसका भी नुकसान गठबंधन को हो सकता है। मुलायम तो खुलकर गठबंधन के खिलाफ आ गए हैं।
उनके भरोसेमंद कई नेता या तो दूसरे दलों में चले गए हैं या फिर किनारे कर दिए गए हैं। भितरघात का खतरा बना हुआ है। अखिलेश से नाराज नेता उन सीटों पर गठबंधन को नुकसान पहुंचा सक ते हैं जहां उनका प्रभाव है।
मुस्लिमों का भरोसा जीतना भी बड़ी चुनौती
सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतना भी एक बड़ी चुनौती है। बसपा प्रमुख मायावती मुसलमानों को अपने साथ खड़ा करने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही हैं।
बसपा यह संदेश देने की कोशिश भी कर रही है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने का माद्दा उसी में है। ऐसे में गठबंधन के सामने मुसलमानों का भरोसा जीतना बड़ी चुनौती होगा। सपा-कांग्रेस गठजोड़ का मुसलमानों के बीच संदेश तो गया है लेकिन इसे वोट में बदलना आसान नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल का मानना है अगर मुस्लिम वर्ग गठबंधन के साथ आ जाता है तो निश्चित तौर पर इसका फायदा होगा लेकिन मायावती भी मुस्लिमों को अपने साथ जोड़ने की मुहिम में जुटी हैं। सपा-कांग्रेस गठजोड़ की पृष्ठभूमि भी मुस्लिम वोटबैंक ही है।
देखना होगा कि दोनों मुसलमानों में कितना भरोसा पैदा कर पाते हैं। जहां तक चुनौतियों का सवाल है तो भाजपा-सपा के पास तो प्रचारकों की लंबी चौड़ी फौज है जबकि कांग्रेस के पास राहुल के अलावा कोई नहीं है और वह भी बहुत प्रभावी नहीं है। विधानसभा चुनाव में प्रदेश के नेताओं की भूमिका ज्यादा अहम होती है। कांग्रेस के पास ऐसा कोई नेता नहीं है।