प्रदेश में पिछले साल अतिवृष्टि व बाढ़ से आम लोगों के हुए नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र से भारी-भरकम मदद हासिल करने की राज्य सरकार की योजना धराशाई हो गई है।
सूबे के अफसरों ने आपदा राहत मद में केंद्रीय मदद मांगने के लिए बनी गाइडलाइन को दरकिनार कर केंद्र को मांगपत्र पेश किया। नतीजा यह हुआ कि प्रदेश को बाढ़ राहत मद में कानी-कौड़ी भी नसीब नहीं हो पाई।
प्रदेश में पिछले साल बरसात के मौसम में अतिवृष्टि व अप्रत्याशित बाढ़ की वजह से बड़ी संख्या में जन-धन व सार्वजनिक परिसंपत्तियों का नुकसान हुआ था।
230 करोड़ भी नहीं मिले
करीब 39 जिले, 85 तहसीलें बाढ़ से प्रभावित हुईं थीं। तमाम घर ढह गए थे। बंधे बह गए थे। सड़कें बर्बाद हुईं थीं। 300 से ज्यादा लोगों की जान गई थी। बड़ी तादाद में पशुओं की मौत हुई थी।
प्रदेश सरकार ने इस नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र से आपदा राहत के नाम पर 3210 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मांगी थी। बाद में केंद्र ने अपनी टीम भेजकर मांगपत्र की गाइडलाइन के आइने में स्थलीय जांच कराई थी, जिसमें तमाम खामियां सामने आईं।
नतीजा यह हुआ कि केंद्रीय टीम ने 3210 करोड़ के मांगपत्र में मात्र 230 करोड़ की मांग का औचित्य पाया। दूसरी लापरवाही यह कि केंद्र से रकम तो मांग ली, लेकिन पहले से राज्य आपदा मोचक निधि में उपलब्ध धन खर्च नहीं किए।
केंद्र ने यह कहते हुए 230 करोड़ देने से इन्कार कर दिया कि राज्य आपदा मोचक निधि में इससे अधिक राशि पहले से है।
ये है नियम
आपदा राहत के नियमों के इस फंड का उपयोग आपदा पीड़ितों को राहत पहुंचाने पर केंद्रित होना चाहिए। मसलन, मृतक परिजनों की सहायता, घायलों की मदद, फसल नष्ट होने, घर गिरने, राहत तथा बचाव व बाढ़ प्रभावित बड़े समूह को शरण दिलाने जैसे कार्य शामिल हैं।
बाढ़ के दौरान इन्फ्रास्ट्रक्चर के उसी नुकसान की भरपाई के लिए मदद मांगी जानी चाहिए जिससे लोगों को तत्काल राहत दी गई हो।
इस तरह पकड़ी खामियां
केंद्र ने संयुक्त सचिव बुंगलू मांग के नेतृत्व में एक दल को भेजकर प्रदेश सरकार के मांगपत्र की स्थलीय जांच कराई। टीम ने 25 से 27 नवंबर, 2013 के बीच एक दर्जन जिलों का भ्रमण कर जांच की। टीम ने मांगपत्र में डुप्लीकेसी भी पकड़ी।
कई जगह पता चला कि जिस नुकसान के लिए डीएम ने पैसे मांगे उसी के लिए विभाग ने भी। कई जिलों ने नुकसान का ठीक से आकलन नहीं किया गया था। कई जगह के नुकसान को जिलों की रिपोर्ट में शामिल ही नहीं किया गया था।
यहां पर राज्य सरकार से हुई गलती
राज्य सरकार ने जिस 3200 करोड़ रुपये की केंद्र से मांग की उसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर पुनर्निर्माण के लिए ही करीब 2800 करोड़ रुपये मांग लिए। वह भी तात्कालिक नहीं, रकम मिलने के बाद कराए जाने वाले निर्माण के लिए। जानकार बताते हैं कि यदि पीड़ितों पर केंद्रित मांग होती तो हो सकता है कि इससे काफी ज्यादा रकम मिल जाती।
कैसे चली कैंची
शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि बाढ़ के दौरान सड़क व पुल जैसी दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए राज्यों के पास विभागीय बजट होता है। राज्य सरकार सड़कों का निर्माण कराती हैं तो कार्यदायी संस्था के साथ कुछ सालों तक रखरखाव व मरम्मत का अनुबंध होता है।
ऐसे में यह काम निर्माण एजेंसियों से कराना चाहिए। जिस कार्य के करने की जिम्मेदारी किसी दूसरी एजेंसी की पहले से है, उसके लिए केंद्र से मदद मांगना उचित नहीं है। चूंकि राज्य ने एकमुश्त 2800 करोड़ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर आधारित मांग की लिहाजा उसे निरस्त कर दिया गया।