यूपी की पारिवारिक अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या 2.45 लाख के पार पहुंच चुकी है। अमर इन अदालतों में नए केस न भी आएं तो मौजूदा सभी मामलों को निपटाने में 17 साल लग जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि 190 फैमिली कोर्ट में से केवल 42 में ही जज हैं। ये हकीकत इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के एक फैसले में सामने आई है।
यह खंडपीठ फैमिली कोर्ट को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में अप्रैल 2017 तक के लंबित केसों की संख्या का हवाला दिया गया था।
इस पर जस्टिस श्रीनारायण शुक्ला और जस्टिस शिव कुमार सिंह- प्रथम ने कहा, अगर मान लिया जाए कि मई से एक भी केस दायर नहीं हो और पारिवारिक अदालतों को वैसे ही चलने दिया जाए, जैसे ये अभी चल रही हैं तो इन सभी मामलों पर फैसला सुनाने में 17 साल लग जाएंगे। याचिका न्यायिक अधिकारियों की संस्था यूपी न्यायिक सेवा संघ के महासचिव ने दायर की थी।
प्रदेश में 190 पारिवारिक अदालतें पर 42 में ही जज, यानी 148 खाली
26 मई, 2017 तक के आंकड़ों के अनुसार पारिवारिक मामले निपटाने के लिए यूपी में प्रमुख जज और अपर प्रमुख जजों की 190 अदालतें बनाई गई हैं। लेकिन, सहायक रजिस्ट्रार द्वारा दी गई जानकारियों के अनुसार इनमें सिर्फ 42 न्यायिक अधिकारी ही काम कर रहे हैं। 148 अदालतें खाली हैं। इसलिए लंबित मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं।
याचिका में पारिवारिक अदालतों के दो अलग-अलग नियमों पर सवाल
1. यूपी फैमिली कोर्ट्स रूल्स, 1995 के नियम 36 के अनुसार पारिवारिक न्यायालयों को हाईकोर्ट के अधीन काम करना होगा।
2. यूपी फैमिली कोर्ट्स रूल्स, 2006 के अनुसार फैमिली कोर्ट के जज जिला जजों के प्रशासनिक और विभागीय नियंत्रण में होंगे। इसके बाद समस्त नियंत्रण हाईकोर्ट का होगा।
याची का तर्क
याची संगठन के अनुसार, ये दोनों नियम विरोधीभासी हैं। जजों की समितियों ने कई बार 2005 के नियम को नकारते हुए पारिवारिक अदालतों को हाईकोर्ट के अधीन रखने की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार अब तक कोई निर्णय नहीं ले सकी है।
ऐसा लगता है कभी खत्म नहीं होंगे केस
लखनऊ खंडपीठ का कहना है कि जिस रफ्तार से मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं और इनका निस्तारण हो रहा है। उससे लगता है ये अनिश्चित काल तक चलते रहेंगे। यह एक खतरनाक स्थिति होगी। समाज में परिवारों और वैवाहिक विवादों से जुड़े ये सभी बेहद महत्वपूर्ण मामले हैं।
एक साल में चार गुना से ज्यादा मामले बढ़े
हाईकोर्ट ने कहा, 2013 और 2014 के दर्ज मामलों के आंकड़े भी दर्शा रहे हैं कि मुकदमें लगातार बढ़े हैं। फैमिली कोर्ट में 2013 में 40,589 मुकदमे दर्ज हुए जो 2014 में 4 गुना से ज्यादा बढ़कर संख्या 1,82,027 पहुंच गई।
14 जिलों में 5-5 हजार से ज्यादा मामले लंबित
उत्तर प्रदेश की पारिवारिक अदालतों में लंबित 2 लाख 45 हजार 918 मामलों में से सर्वाधिक लखनऊ, इलाहाबाद और कानपुर नगर में हैं। लखनऊ में 15,620 मामले लंबित हैं तो इलाहाबाद में यह संख्या 9,187 और कानपुर नगर में 8,618 है।
लखनऊ में इन मामलों के लिए तीन पारिवारिक अदालतें लगाई जा रही हैं, जबकि इलाहाबाद व कानपुर में दो-दो। ऐसे में समझा जा सकता है कि हर जज पर मुकदमों का बोझ कितना बढ़ चुका है।
पारिवारिक न्यायालय हाईकोर्ट के अधीन हैं या जिला जजों की प्रशासकीय व विभागीय अधीनता में, इसे लेकर हाईकोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान ये तथ्य सामने आए हैं। इन तीन शहरों के अलावा आगरा, अलीगढ़, आजमगढ़, बरेली, बुलंदशहर, देवरिया, गाजियाबाद, हरदोई, जौनपुर, मेरठ और सुल्तानपुर में पांच-पांच हजार से अधिक मामले लंबित हैं।
इसलिए बने थे पारिवारिक न्यायालय
पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना द फैमिली कोर्ट्स एक्ट 1984 के तहत की गई। इस एक्ट के अनुसार इन न्यायालयों का न्यायिक क्षेत्राधिकार वैसा ही होगा जैसा किसी जिला जज या निचली सिविल कोर्ट का हो सकता है। यहां परिवार और विवाहों से संबंधित विवादों के मामले सुने जाएंगे।
इनमें शादी को खत्म करार देने, शादी की मान्यता साबित करवाने, विवाह के बाद संपत्ति से जुड़े मामले, गुजारा भत्ता के मामले, नाबालिगों की गार्जियनशिप के मामले प्रमुख हैं।
प्रशासकीय समिति के समक्ष उठाया था मुद्दा
याची की ओर से पारिवारिक न्यायालयों के विषय में बताया गया कि यूपी न्यायिक सेवा संघ ने इस मुद्दे को प्रशासकीय समिति के समक्ष उठाया था। समिति ने 12 फरवरी 2012 को प्रदेश के सभी जिलों में एक पारिवारिक अदालत बनाने और यहां हायर ज्यूडिशियल ऑफिसर रैंक के अधिकारी की नियुक्ति के लिए प्रदेश सरकार को प्रस्ताव भेजा।
याची के अनुसार उत्तर प्रदेश फैमिली कोर्ट्स रूल्स, 1995 के नियम 36 में इन न्यायालयों को हाईकोर्ट के अधीन रखा गया है। जबकि उत्तर प्रदेश फैमिली कोर्ट्स (कोर्ट) रूल्स 2006 के नियम 58 में इन्हें जिला जजों के प्रशासनिक और विभागीय नियंत्रण में रखते हुए समस्त नियंत्रण हाईकोर्ट का रखा गया।
समिति ने इस मामले में भी प्रस्ताव पास किया कि पारिवारिक अदालतें जिला जज से स्वतंत्र रहेंगी। सरकार की ओर से प्रमुख सचिव (न्यायिक) ने उसी वर्ष पत्र में बताया कि नियम 58 के प्रावधानों के रहते समिति का प्रस्ताव लागू नहीं किया जा सकता।
63 अदालतों का गठन हुआ
- फोटो : अमर उजाला
इस मसले को पूरी कोर्ट के समक्ष रखा गया और जहां से इसे पास करके फिर से निर्देश भेजे गए। इस पर मई 2013 में सूचित किया गया कि प्रदेश में 63 पारिवारिक अदालतें बनाने की सूचना जारी की गई। इसके लिए 63 जजों सहित 567 पद स्वीकृत किए गए, लेकिन नियम 58 पर कोई निर्णय नहीं हुआ।
हाईकोर्ट का निर्णय
न्यायिक अदालतें किसके अधीन हैं, इस मसले पर हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि वैवाहिक विवादों के मामले बेहद संवेदनशील किस्म के होते हैं। इनके लिए अनुभवी और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की जरूरत होती है।
सरकार और हाईकोर्ट ने प्रमुख जज पारिवारिक अदालत के पद को भरने के लिए डेपुटेशन पॉलिसी अपनाई है। ऐसे में पुराने पैटर्न पर इन जजों को जिला जज के अधीन रखना प्रभावी नहीं होगा। वहीं अगर इन पदों को सीधे प्रमुख जज की नियुक्ति से भरा जाता है, तब भी कोई नुकसान नहीं होगा, इन्हें सीधे हाईकोर्ट के अधीन रखा जा सकेगा।
ऐसे में निर्देश दिए जाते हैं कि उत्तर प्रदेश फैमिली कोर्ट्स (कोर्ट) रूल्स 2006 के नियम 58 को बदला जाए। इसके लिए रजिस्ट्रार मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विचार के लिए रखेंगे।
ये है जजों की स्थिति
- फोटो : डेमो फोटो
स्वीकृत पद- 3028
नियुक्त- 2251
खाली- 777 (28 फरवरी, 2017 तक का आंकड़ा।)
निचली अदालतों के भी हाल बेहाल...
लंबित केस- 60,20,302
सिविल- 15,13,290
क्रिमिनल- 45,07,012
जिला अदालतो की स्थिति
क्लास 3 कॉडर के 14,089 पद स्वीकृत, इनमें से केवल 9,980 पर नियुक्तियां। 4,109 पद खाली हैं।
क्लास 4 काडर में 8,700 स्वीकृत पदों में से 1,742 पद खाली हैं।