लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (लूटा) की कवायद और 15 दिन चले घमासान का कोई खास नतीजा नहीं निकला। विवि के 30 शिक्षकों लिखकर दिया था कि 6 महीने में अपने अधीन रजिस्टर्ड शोधार्थियों की थीसिस जमा करा देंगे, इसके बाद भी पीएचडी सीटों की संख्या मात्र आठ ही बढ़ी।
पूर्व में घोषित 514 की जगह सीटों की संख्या अब 522 हो गई है। जबकि ब्रोशर के साथ विवि ने 648 सीटों पर आवेदन मांगे थे। इस तरह पहले के मुकाबले 126 सीटें कम होंगी। विवि द्वारा प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के बाद बीच में नियमों को संशोधित करके उन शिक्षकों को सीटें अलॉट करने से मना कर दिया गया जो अगले तीन साल में सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
हालांकि शिक्षकों के विरोध के बाद इसमें राहत दी गई, फिर भी अंतिम रूप से मार्च 2022 से पहले सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षकों को सीटें नहीं दी गईं। इसी तरह विवि ने असिस्टेंट, एसोसिएट व प्रोफेसर को एक साथ आठ सीटें आवंटित करने की जगह तीन साल में चरणबद्ध सीटों के आवंटन का निर्णय लिया।
इसमें राहत दी गई लेकिन प्रोफेसर्स को एक साल में सिर्फ तीन सीटें ही दी गई हैं। सीटों का मामला लूटा चुनाव का मुद्दा भी बना और नए पदाधिकारियों ने इसके लिए कवायद भी शुरू की। समझौता हुआ, लेकिन नतीजा अंतिम रूप से उनके पक्ष में नहीं रहा। पूर्व में घोषित सीटों में अपेक्षाकृत बहुत कम वृद्धि हुई। अब इसे लेकर लूटा भी खिन्न है, लेकिन इस पर बोलने के लिए कोई तैयार नहीं है। विवि में पीएचडी के आधे इंटरव्यू भी हो चुके हैं।