किसानों की कर्जमाफी के लिए बजट पर माथापच्ची कर रही योगी आदित्यनाथ सरकार की शासन के आला अफसरों ने किरकिरी करा दी। योगी सरकार ने पहली ही कैबिनेट बैठक में 31 मार्च 2016 तक के फसली ऋण को माफ करने का निर्णय किया था।
लेकिन राज्यपाल राम नाईक के अभिभाषण में इसकी तारीख 31 दिसंबर 2016 बताई गई। अब कंफ्यूजन खड़ा हो गया है कि कैबिनेट की घोषणा सही है या राज्यपाल का अभिभाषण।
मुद्दे को धार देने में जुटे विपक्ष को अफसरों ने नया हथियार पकड़ा दिया है। भाजपा के चुनाव संकल्प-पत्र के मुताबिक सरकार ने चार अप्रैल को अपनी पहली कैबिनेट बैठक में कर्जमाफी का एलान किया था।
इसके मुताबिक 31 मार्च 2016 तक लघु व सीमांत किसानों द्वारा लिए गए फसली ऋण पर 31 मार्च 2017 तक अदा की गई रकम को घटाकर एक लाख रुपये तक की राशि माफ करने का फैसला किया था।
इससे 86 लाख किसानों को फायदा मिलने और 36 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आने का अनुमान बताया गया था। योगी सरकार इस निर्णय के हिसाब से कर्जमाफी की रकम के बंदोबस्त में लगी हुई है। इस बीच 17वीं विधानसभा का पहला सत्र सोमवार से शुरू हुआ।
इसमें राज्यपाल राम नाईक ने विधानसभा व विधान परिषद के संयुक्त बैठक में अपना अभिभाषण दिया। राज्यपाल ने अपने अभिभाषण के पेज 3 को पढ़ते हुए एलान किया कि 31 दिसंबर 2016 तक किसानों द्वारा लिए गए एक लाख रुपये तक केफसली ऋण को माफ किया जाएगा।
इस तरह कैबिनेट व राज्यपाल के एलान में बड़ा अंतर हो गया। मंगलवार से राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा भी शुरू हो गई है। विपक्ष को इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है। सरकार को सदन में स्पष्ट करना पड़ सकता है कि उसका कैबिनेट का निर्णय सही है या राज्यपाल की बात।
टंकण त्रुटि या साजिश का हिस्सा
राज्यपाल रामनाईक
- फोटो : amar ujala
कैबिनेट के निर्णय व राज्यपाल के अभिभाषण में सिर्फ कर्जमाफी के कट ऑफ डेट का ही अंतर है। इस फैसले से लाभ पाने वाले किसानों और इससे सरकार पर आने वाले अतिरिक्त खर्च की रकम का समान उल्लेख हुआ है।
इससे प्रथम दृष्टया यह लिपिकीय त्रुटि माना जा रहा है। पर, राज्यपाल का अभिभाषण तैयार करने की जो व्यवस्था है, उसमें इस तरह की चूक मामूली बात नहीं है। इस प्रक्रिया में सभी विभागों से इनपुट जुटाया जाता है और शासन के शीर्ष अधिकारियों की देखरेख में इसे अंतिम रूप दिया जाता है।
सरकार के एक जिम्मेदार अफसर नाम न छापने के आग्रह के साथ कहते हैं कि जिस तरह पिछली सरकार के समय में तैनात कई शीर्ष अधिकारी अब भी तैनात हैं, यह सोची-समझी शरारत भी हो सकती है।
अफसर समझते हैं कि बाद में इसे त्रुटि बताकर पल्ला झाड़ लिया जाएगा। पर, जिस तरह कट ऑफ डेट 31 मार्च की जगह 31 दिसंबर हुई है, सवाल पैदा कर रहा है। 31 दिसंबर वह डेट है जिसमें विधानसभा चुनाव के पहले तक कर्ज लेने वाले लगभग सभी किसान आ जाते हैं।
अब विपक्ष सरकार पर राज्यपाल के अभिभाषण को पूरा करने का दबाव बढ़ाएगा। सरकार 31 मार्च तक की कर्जमाफी करती है तो उस पर 36 हजार करोड़ का खर्च आने का अनुमान लगाया गया है।
यदि सरकार राज्यपाल के अभिभाषण पर अमल करे तो उसका खर्च करीब दो गुना तक यानी करीब 75 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है। सरकार को एक बजट में इतनी रकम का बंदोबस्त कर पाना आसान नहीं होगा। प्रदेश में करीब 2.33 करोड़ किसान हैं। इसमें 92 फीसदी लघु व सीमांत किसान हैं।
‘‘कैबिनेट ने कर्जमाफी की कट ऑफ डेट 31 मार्च 2016 ही तय की है। इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है। 31 दिसंबर 2016 किस तरह से अभिभाषण में आया है, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।’’ - राजेश अग्रवाल, वित्त मंत्री