सूबे के उपचुनाव में बसपा के मुकाबले से हट जाने के बाद मोदी-मुलायम एक बार फिर आमने सामने हैं जिसमें मोदी की सफलता और मुलायम को एक बार फिर परखा जाएगा।
बसपा के उपचुनाव में भाग न लेने की घोषणा के बाद लोकसभा की एक, विधानसभा की 12 व विधान परिषद की एक सीट के उप चुनाव काफी दिलचस्प हो गए हैं।
सपा और भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव साख लौटाने व साख बचाने की कसौटी बन गए हैं तो सूबे के नए सियासी समीकरणों की दिशा व दशा समझने का पैमाना भी।
चुनाव के नतीजों से मोदी लहर की दिशा और दशा का अंदाज होगा ही तो यह भी पता चलेगा कि मुस्लिम मन में क्या हलचल चल रही है।
इन सवालों के मिलेंगे जवाब
उपचुनाव में यह भी पता चलेगा कि मुस्लिम वोटों में बंटवारे से भाजपा को लाभ मिलने की बात सही है या जातियों की दिलचस्पी में बदलाव ने लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा जैसे दलों की जड़ें हिला दी हैं अथवा सूबे की सियासत में जातिवाद जैसे तत्व पूर्ववत मजबूत हैं।
दरअसल, विधानसभा व विधान परिषद की जिन 13 सीटों पर उपचुनाव होना है। वह सभी भाजपा के कब्जे वाली है। इनमें कुछ पर तो भाजपा कई-कई बार जीत चुकी है।
सिर्फ लोकसभा की मैनपुरी सीट ही एकमात्र ऐसी सीट हैं जो जिस पर लंबे समय से समाजवादी पार्टी की झंडा बुलंद होता रहा है। स्वाभाविक है कि भाजपा व सपा अपने इन गढ़ों पर हर हालत में कब्जा बरकरार रखना चाहेंगे।
तय होगा राजनीतिक वजूद
सपा, भाजपा की एक दूसरे के गढ़ में सेंध सिर्फ उसकी जीत या हार नहीं तय करेगी बल्कि उसका राजनीतिक वजूद भी तय करने वाली होगी।
जिससे लोकसभा चुनाव के नतीजों का सच भी पता चलेगा तो सियासत के भावी रुख का भी अंदाज लगेगा।
उपचुनाव में जनता का रूख यह भी बताएगा कि प्रदेश में भाजपा की अप्रत्याशित सफलता सिर्फ एक तुक्का थी या नहीं।
गौरतलब है कि भाजपा ने यूपी में अपना दल के गठबंधन के साथ मिलकर 73 सीटें जीती, जिसमें भाजपा की 71 सीटें हैं।
कांग्रेस मुकाबले से बाहर
सपा के चुनाव न लड़ने के ऐलान के बाद सूबे में ज्यादातर सीटों पर अब सपा और भाजपा के बीच सीधे मुकाबले के आसार बन गए हैं।
सिर्फ लखनऊ पूर्व और सहारनपुर सदर जैसी शहरी सीटों पर ही लड़ाई कांग्रेस त्रिकोणीय बना सकती है। शेष सीटों पर राजनीतिक परिदृश्य देखते हुए कांग्रेस का पंजा कोई बहुत बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में नहीं दिख रहा है।
ऐसी स्थिति में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा के पाले में जाने की संभावना दिख रही है। बशर्ते स्थानीय राजनीतिक परिस्थिति इसमें बाधा न बन रही हो। जिससे सपा का हौसला बढ़ सकता है।
पर, देखने वाली बात यही होगी कि बसपा का परंपरागत वोट माना जाने वाले दलित किस तरफ बढ़ता है। वह सपा पर भरोसा करता है या भाजपा के साथ खड़ा होता है।
भाजपा को लाभ की ज्यादा संभावना
लोकसभा चुनाव को आधार बनाएं तो बसपा की गैर मौजूदगी में दलित वोटों के भाजपा के पक्ष में ही जाने की ज्यादा संभावना दिख रही है।
एक तो बसपा के स्थानीय नेता भी नहीं चाहेंगे कि उनके यहां से सपा जीते और उनके भविष्य के समीकरण हमेशा-हमेशा के लिए गड़बड़ा जाएं।
साथ ही लोकसभा चुनाव में जिस तरह दलित और अति पिछड़ा मतदाता भाजपा के पक्ष में जाते दिखा है, उसके मद्देनजर भी दलित मतदाताओं के सपा के साथ जाने की संभावना फिलहाल कम ही है।
पूरे प्रदेश का लिटमस टेस्ट
इन उप चुनाव के नतीजों से पूरे प्रदेश की सियासत का लिटमस टेस्ट हो जाएगा, क्योंकि यह सीटे पश्चिम से लेकर बुंदेलखंड व पूर्वांचल तक फैली हैं।
बिजनौर, गौतमबुद्धनगर, कैराना, सहारनपुर, ठाकुरद्वारा पश्चिम में हैं तो हमीरपुर और चरखारी बुंदेलखंड में सिराथू (कौशांबी) और रोहनिया (वाराणसी) पूर्वांचल की सीटें हैं तो बलहा (बहराइच) और लखीमपुरखीरी प्रदेश के मध्य क्षेत्र में आती है।
इन सीटों पर लोकसभा चुनाव में जिस तरह के संकेत मिले हैं, उसके चलते भी बसपा के न होने का सीधा-सीधा लाभ भाजपा को मिलने की उम्मीद है। सिर्फ वाराणसी की रोहनिया सीट ऐसी है जहां अपना दल व सपा के बीच मुकाबला हो।
कारण, अपना दल के राजग गठबंधन में शामिल होने के नाते भाजपा की तरफ से रोहनिया में उम्मीदवार उतारने की संभावना कम ही है। इसलिए इन सीटों के नतीजे पूरे प्रदेश का राजनीतिक रुझान बताने वाले होंगे। साथ ही लोकसभा चुनाव में बह रही बयार का प्रभाव बने रहने या उसमें कमी अथवा मजबूती आने का भी संकेत देंगे।
पिछड़ा वोट कसौटी पर
लोकसभा चुनाव में जिस तरह समाजवादी पार्टी की बुरी तरह शिकस्त हुई है। उससे यह बात भी साफ हो गई है कि भाजपा को न सिर्फ दलित वोट मिले हैं बल्कि उसे पिछड़ी व अति पिछडी जातियों का भी समर्थन मिला है।
अब देखने वाली बात यह है कि जब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा से सीधे मुकाबले की स्थिति बन रही है तो इन जातियों का रुख किधर रहता है। वह लोकसभा चुनाव की तरह मोदी पर भरोसा करते हुए भाजपा के पक्ष में खड़े होकर यह साबित करते हैं कि जनता ने सियासत में जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों को हाशिए पर डालने का फैसला कर लिया है
अथवा सपा के साथ लौटकर कुछ राजनीतिक समीक्षकों के इस निष्कर्ष को सही साबित करते हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों के नाते राष्ट्रीय चुनाव में वह भाजपा के साथ थे। पर, राजनीति में जाति का प्रभाव खत्म होने का निष्कर्ष जमीनी नहीं है।
राष्ट्रीय स्तर पर वह जाति को महत्व नहीं देंगे लेकिन स्थानीय स्तर पर जातीय गोलबंदी उनकी प्राथमिकता रहेगी। लोकसभा चुनाव में उनका मुलायम या मायावती से अलग होना राजनीति में बदलाव व जातीय दीवार टूटने की शुरुआत अथवा सूबे की सियासत के चरित्र में किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन का प्रारंभ नहीं था।
चुनौती सपा और भाजपा की
समाजवादी पार्टी इन उपचुनाव के जरिये अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी। इसके लिए वह पूरी ताकत लगा देगी, क्योंकि उसे मालूम है कि विधासभा की एक सीट भी उसने जीत ली तो सपा नेताओं को बड़ा मनौवैज्ञानिक लाभ मिल जाएगा।
सपा कार्यकर्ताओं में हौसला आ जाएगा और नेताओं को यह कहने का अवसर कि लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बावजूद जमीन पर सपा का आधार मजबूत है।
सपा नेता भाजपा को घेर सकेंगे और यह भी कह सकेंगे कि मोदी की बातों की सच्चाई जनता की समझ में आने लगी हैं। इसी संदर्भ में भाजपा के लिए भी यह उप चुनाव बहुत महत्वपूर्ण व प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए हैं।
भाजपा जीती तो मिलेगा ये लाभ
भाजपा अगर सभी सीटें कब्जे में रखने में कामयाब हो जाती है तो उसे इसका बड़ा लाभ मिलेगा। मनौवैज्ञानिक बढ़त भी मिल जाएगी और यह साबित हो जाएगा कि मोदी लहर यथावत बरकरार है।
लोगों का भाजपा पर भरोसा कायम है। पर, एक भी सीट हार गई तो पार्टी नेताओं को जवाब देते नहीं बनेगा।
काफी किरकिरी होगी। यही हाल लोकसभा की एक और विधान परिषद की एक सीट के नतीजों का भी है। यह सीटें संख्या में भले ही एक-एक हों लेकिन इनके नतीजे दूरगामी असर वाले होंगे।
किसी वजह से लोकसभा सीट सपा के हाथ से निकली तो भाजपा को बहुत बड़ी मनौवैज्ञानिक ताकत मिल जाएगी और विधान परिषद सीट भाजपा अपने पास न रख पाई तो सपा को यही लाभ होगा।