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'इम्पोर्टेड नेताओं' के सहारे ही यूपी का रण जीतेगी भाजपा

Mon, 20 Jul 2015 10:44 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ
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भले ही भाजपा को यूपी से 73 सांसद मिल गए हों, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को शायद अभी यूपी के भाजपाइयों पर भरोसा नहीं जम पा रहा है। बाराबंकी की घटना की जांच के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की तरफ से सांसदों के केंद्रीय दल को भेजने और उसमें सभी सदस्यों का दूसरे राज्य से शामिल होने से यह बात साबित हो जाती है।
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मौका पार्टी के लिए खुशी मनाने का हो या लोगों के दुखों में शामिल होने का। हर काम के लिए नेतृत्व दूसरे राज्यों के पार्टी सदस्यों को ही यूपी में भेजकर संदेश देने की कोशिश करता है।

पार्टी के एक पूर्व राष्ट्रीय पदाधिकारी इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व की नीति और नीयत पर सवाल उठाने के बजाय यूपी वालों को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। कहते हैं कि जब हम सूबे की सरकार की असफलताओं को मुद्दों में नहीं बदल पाएंगे। विरोध टोकन बनकर ही रह जाएंगे। तब यह स्थिति तो आनी ही है।
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कहते हैं कि बाराबंकी की घटना में केंद्रीय नेतृत्व द्वारा सांसदों का जांच दल तो घटना घटने के एक सप्ताह बाद वहां गया। प्रदेश की टीम चाहती तो उससे पहले यहां के विधायकों का एक दल को भेज सकती थी। पत्रकार जगेंद्र की घटना घटे अब तो महीना भर से ऊपर हो गया। पर, भाजपा के प्रदेश के नेता इस मुद्दे पर भी न तो बहुत मुखर हो पाए और अब तक जा पाए।

इन मामलों में भी भाजपा ने मुंह की खाई

इस हाल में और हो भी क्या: पूर्व पदाधिकारी की बात हालात पर खरी उतरती दिखाई देती है। महोबा, बांदा व कन्नौज की घटनाओं की जांच के लिए पार्टी को जांच कमेटी बनाने की फिक्र तब हुई जब सांसदों का केंद्रीय दल बाराबंकी हो आया।

इन स्थानों पर घटनाएं घटे काफी वक्त गुजर चुका है। पार्टी नेतृत्व सचेत होता तो जांच कमेटी भेजने का काम कब का हो चुका होता। आंदोलन की बात करें तो भी औपचारिकता ज्यादा दिखती है।

हाल में ही राजधानी में सूबे के सांसदों के धरने पर नजर डालें तो दो दिन सड़क पर बैठने के बावजूद भाजपा प्रदेश सरकार को घेरने का संदेश नहीं दे पाई। उल्टे मुख्यमंत्री आवास जाने के बजाय राजभवन जाकर और वहां भी राज्यपाल की अनुपस्थिति में उनकी प्रमुख सचिव को ज्ञापन देकर और किरकिरी करा ली।

लोगों ने इसे विरोध कम रस्म अदायगी ज्यादा करार दिया। कई सांसदों को भी यह बात अखरी। उन्होंने कहा भी कि जब यही करना था तो बेकार दो दिन सड़क पर बैठाए रखा।

अपनी देखरेख में ही चुनाव चाहता नेतृत्वः शायद इसी कारण पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यूपी की लड़ाई को अपनी देखरेख व अपने लोगों के भरोसे लड़ना चाहता है।वैसे प्रयोग तो 2012 में भी हुए थे। बाहर वालों की देखरेख में चुनाव लड़ा गया। पर, वजह बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा में शामिल करने का प्रकरण हो या टिकट बंटवारे को लेकर मची मारामारी। भाजपा बाहर वालों के सहारे मैदान मारने के सपने को साकार नहीं कर पाई।

अमित शाह के आने के बाद प्रयोग सफल

पर, अमित शाह के प्रदेश का प्रभारी बनने के बाद जब उन्होंने यह प्रयोग दोहराया तो लोकसभा चुनाव में सफल हो गया। हालांकि इसकी एक वजह उन्हें मोदी का समर्थन भी रहा। मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद शाह को यूपी का प्रभारी बनाया गया।

इसलिए शाह के फैसलों पर सवाल न उठने की एक वजह फैसलों पर नुक्ताचीनी करने पर राजनीतिक कॅरिअर को लेकर खड़ा होने वाला संकट भी रहा। शायद यही वजह शाह के यूपी ऑपरेशन में मददगार बनी।

उन्होंने यहां के जमे-जमाए नेताओं को रीति-नीति तय करने से लेकर निर्णयों तक से अलग कर दिया।

कई बड़े नेताओं की चुनाव लड़ने या अपने किसी को लड़ाने की इच्छा की अनसुनी करते हुए अपने तरीके से फैसले किए। कई की चुनाव लड़ने की इच्छा दिल में धरी रह गई। पर, मोदी के भय से न तो विरोध ही मुखर हो पाया और न खींचतान।
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इस तरह हो रही है किलेबंदी

लोकसभा चुनाव में प्रदेश प्रभारी शाह ने पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह,स्मृति ईरानी से लेकर कंवर सिंह तंवर कई ऐसे लोगों को टिकट दिए,जो दूसरे राज्यों के थे। शाह अपने सहयोगी के रूप में सुनील बंसल को लाए। राजस्थान के रहने वाले बंसल को शाह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश में महामंत्री (संगठन) बनाया।

यह पहला मौका था जब भाजपा में किसी दूसरे राज्य के व्यक्ति को यूपी में महामंत्री (संगठन) की जिम्मेदारी सौंपी गई। यूपी से भाजपा के हिस्से की राज्यसभा सीट रिक्त हुई तो वह गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को देकर दिल्ली भेज दिया गया। फिर उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया।

शाह के बाद यूपी के प्रभारी बने ओम माथुर भी मोदी के विश्वासपात्र लोगों में ही माने जाते हैं। माथुर के सहयोगी के रूप में तैनात किए पांच सह प्रभारियों रामेश्वर चौरसिया, सत्येंद्र कुशवाहा, सुनील ओझा, वीरेंद्र खटिक और रमेश विधूड़ी भी दूसरे राज्यों से हैं। इनमें ओझा गुजरात से हैं।

साफ है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनाव भी बाहर वालों की देखरेख में ही लड़ने की तैयारी कर ली है।
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