रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दलित कार्ड ही नहीं खेला है बल्कि विरोधियों को पटकनी देने की भी कोशिश की है। भविष्य में दूसरे राज्यों में होने वाले चुनाव में दलितों को साधकर समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश इसमें दिखती है, वहीं 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव की गणित भी ठीक करने का प्रयास नजर आ रहा है।
भाजपा के इस दांव के सामने विपक्ष के लिए एक होकर कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध करना अब आसान नहीं रह गया है। उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में बनी सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में दलित वर्ग की आबादी में कोरी जाति का प्रतिशत 5.39 प्रतिशत है। लगभग 6 के आसपास पहुंच गया है।
जानकारी के मुताबिक, यूपी के अलावा मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड व गुजरात में अलग-अलग उप नामों वाली इस जाति की अच्छी आबादी है। हालांकि यह सही है कि देश में लगभग 24प्रतिशत दलित आबादी मेें कोरी आबादी अन्य जातियों से काफी कम है।
पर, भाजपा ने कोविंद के बहाने कोशिश की है कि देश की पूरी दलित बिरादरी उसे दलितों की चिंता करने वाली पार्टी के रूप में समझे। यह भी बताने की कोशिश की है कि भाजपा ही उनके सम्मान, स्वाभिमान और सरोकारों की चिंता करने वाली है।
दूसरे दल सिर्फ दलितों और पिछड़ों के नाम का प्रयोग करते हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि दलित कार्ड खेलने से उसे न सिर्फ गुजरात चुनाव में लाभ मिलेगा बल्कि बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में भी जमीन मजबूत करने में मदद मिलेगी। एक तरह से कोविंद की उम्मीदवारी भाजपा के दलित, आदिवासी और अति पिछड़ों को जोडऩे के लिए चलाए जा रहे अभियान का ही हिस्सा नजर आता है।