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भाजपा ने खेला दलित कार्ड, कोविंद के बहाने आगे की तैयारी

Tue, 20 Jun 2017 01:49 PM IST
amarujala.com, written by अखिलेश बाजपेयी
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रामनाथ कोव‌िंद
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रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दलित कार्ड ही नहीं खेला है बल्कि विरोधियों को पटकनी देने की भी कोशिश की है। भविष्य में दूसरे राज्यों में होने वाले चुनाव में दलितों को साधकर समीकरण दुरुस्त करने की को‌श‌िश इसमें ‌द‌िखती है, वहीं 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव की गणित भी ठीक करने का प्रयास नजर आ रहा है।
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भाजपा के इस दांव के सामने विपक्ष के लिए एक होकर कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध करना अब आसान नहीं रह गया है। उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में बनी सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में दलित वर्ग की आबादी में कोरी जाति का प्रतिशत 5.39 प्रतिशत है। लगभग 6 के आसपास पहुंच गया है।

जानकारी के मुताबिक, यूपी के अलावा मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड व गुजरात में अलग-अलग उप नामों वाली इस जाति की अच्छी आबादी है। हालांकि यह सही है कि देश में लगभग 24प्रतिशत दलित आबादी मेें कोरी आबादी अन्य जातियों से काफी कम है।
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पर, भाजपा ने कोविंद के बहाने कोशिश की है कि देश की पूरी दलित बिरादरी उसे दलितों की चिंता करने वाली पार्टी के रूप में समझे। यह भी बताने की कोशिश की है कि भाजपा ही उनके सम्मान, स्वाभिमान और सरोकारों की चिंता करने वाली है।

दूसरे दल सिर्फ दलितों और पिछड़ों के नाम का प्रयोग करते हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि दलित कार्ड खेलने से उसे न सिर्फ गुजरात चुनाव में लाभ मिलेगा बल्कि बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में भी जमीन मजबूत करने में मदद ‌म‌िलेगी। एक तरह से कोविंद की उम्मीदवारी भाजपा के दलित, आदिवासी और अति पिछड़ों को जोडऩे के लिए चलाए जा रहे अभियान का ही हिस्सा नजर आता है। 
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मायावती ने कही कोव‌िंद को समर्थन देने की बात

मायावती - फोटो : amar ujala
कोविंद उत्तर प्रदेश से भाजपा के ऐसे दूसरे दलित चेहरे हैं जिन्हें एक महीने के अंदर संवैधानिक पद पर बैठाने का फैसला किया गया है। उनसे पहले आगरा से सांसद राम शंकर कठेरिया को अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका है।

कोविंद के बहाने भाजपा ने अपनी उसी रणनीति को आगे बढ़ाया है जिस पर वह लोकसभा चुनाव के पहले से काम कर रही है और सफल भी होती आ रही है। कोविंद की उम्मीदवार भाजपा की देश में राजनीतिक लड़ाई को 80 बनाम 20 बनाने की रणनीति का ही हिस्सा नजर आ रही है।

कारण, भाजपा के रणनीतिकारों का पता है कि आगे होने वाले चुनाव में विरोधी दल आपस में गठबंधन करके उसके मुकाबले उतर सकते हैं। जिससे वोटों की गणित मुश्किल हो सकती है।

इसीलिए भाजपा हर वह प्रयास कर रही है जिससे80 प्रतिशत वोट उसके पाले में आ जाएं। पिछले दिनों भाजपा नेता यह कह भी चुके हैं कि उनकी कोशिश 80प्रतिशत लोगों को साथ में जोडऩे की है।

दरअसल, भाजपा ने कोविंद के जरिये एक तीर से कई निशाने साधे हैं। उसने कांग्रेंस ही नहीं बल्कि देश में अति पिछड़े और दलित हितैषी चेहरे की राजनीति करने वाली बसपा, द्रुमुक व  जनता दल ही नहीं बल्कि वामपंथी दलों के सामने भी असमंजस खड़ा करने की कोशिश की है।

जिसका प्रमाण बसपा सुप्रीमो मायावती का यह बयान है जिसमें उन्होंने असमंजस के साथ राजग उम्मीदवार कोविंद के समर्थन की बात कही है। मायावती ने कहा कि हालांकि कोरी बिरादरी बहुत नहीं है लेकिन फिर भी विपक्ष की तरफ से अगर कोई बेहतर उम्मीदवार नहीं आता तो उनकी पार्टी राजग उम्मीदवार कोविंद का ही समर्थन करेगी।

 
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​भाजपा इस तरह करती रही है कोशिश

bjp logo
बात यही खत्म नहीं होती। विपक्ष अब अगर कोविंद के मुकाबले कोई दलित चेहरा ले भी आता है तो भी भाजपा को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि विपक्ष दलितों विरोधी है।

तभी वोट न होते हुए भी भाजपा के दलित उम्मीदवार की राह मुश्किल बनाने की कोशिश की। अगर दलित चेहरे के अलावा भी कोई उम्मीदवार उतारा जाता है तो भी उसे विरोधियों को दलित विरोधी ठहराने का मौका मिलेगा। 

कोविंद को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अगड़ों के साथ पिछड़ों व दलितों की लामबंदी का महत्व उसने समझ लिया है। इसीलिए उसने आगे भी इसी रणनीति पर काम करने का मन बना लिया है।

जिसमें अगड़ों के साथ दलितों और पिछड़ों को लामबंद करने के लिए उनके सम्मान, स्वाभिमान और सरोकारों पर ध्यान तथा प्रतीकों से हिंदुत्व को धार देने की रणनीति शामिल है।

गौरतलब है कि केंद्र में सरकार बनने के बाद से ही भाजपा डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम और उनसे जुड़े स्थलों के विकास पर ध्यान, संत रविदास से लेकर इस वर्ग के अन्य महापुरुषों के स्थलों की चिंता का संदेश देकर दलितों को जोडऩे की कोशिश करती रही है।

भीम एप, स्टैंड अप इंडिया, उज्ज्वला, सुकन्या समृद्धि योजनाएं भी उसकी इसी कोशिश का हिस्सा रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने राज्य में विधानसभा के300 से ज्यादा क्षेत्रों में धम्म चेतना यात्रा निकालकर भी दलित वर्गों को जोडऩे की कोशिश की। जिसमें वह सफल भी रही।   
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