पूर्वांचल की सोशल इंजीनियरिंग दुरुस्त करने में जुटी भाजपा छोटे दलों से दोस्ती को बेकरार है। उसकी कोशिश पूर्वांचल में अलग-अलग जिलों में सक्रिय छोटे दलों को साथ लेकर वोट की गणित दुरुस्त करने की है।
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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की ओर से 9 जुलाई को मऊ में ओम प्रकाश राजभर के भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन की घोषणा और इससे पहले 2 जुलाई को अपना दल की अनुप्रिया पटेल द्वारा पार्टी के संस्थापक सोनेलाल पटेल की स्मृति में वाराणसी के रोहनिया जगतपुर में आयोजित स्वाभिमान रैली में शाह की मौजूदगी इसका प्रमाण है।
कुछ और छोटे दलों से भाजपा नेताओं की बातचीत चल रही है। हालांकि यह भविष्य में चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा कि भाजपा को छोटे दलों को साथ लेने से कितना लाभ हुआ लेकिन भगवा रणनीतिकारों की कोशिश यही है कि चुनावी चक्रव्यूह तैयार करने में कोई कसर न रहे।
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जल्द ही इन जातियों से होगी गठबंधन की घोषणा
- फोटो : amar ujala
राजभर के अलावा पूर्वांचल में प्रभावी बिंद, केवट, निषाद, कश्यप, बेलदार, मझवर, रैकवार, बाथम, लोधी व मल्लाह सहित लगभग डेढ़ दर्जन नामों से चर्चित जातियों को भाजपा अपने पक्ष में साधना चाहती है।
इसलिए उसकी नजर इन जातियों का नेतृत्व करने वाले स्थानीय नेताओं पर है। इसके लिए भाजपा के रणनीतिकार अलग-अलग नाम से इन जातियों के बीच सामाजिक संगठन चलाने वालों से बातचीत कर रहे हैं।
इन जातियों को आधार बनाकर प्रगतिशील मानव समाज पार्टी गठित कर राजनीति में सक्रिय प्रेमचंद्र बिंद इसकी पुष्टि भी करते हैं। वह आश्वस्त हैं कि जल्द ही गठबंधन की औपचारिक घोषणा हो जाएगी।
इन जातियों के वोटों पर भी है खास नजर
राजभर के अलावा भाजपा की नजर पूर्वांचल के कई जिलों में प्रभावी लोनिया व चौहान वोटों पर भी है। लोनिया, नोनिया, गोले-ठाकुर, लोनिया-चौहान जैसी लगभग आठ-दस नामों से जानी जाने वाली जातियों को आधार बनाकर भी भाजपा के रणनीतिकार समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश में हैं।
इन जातियों की चेतना को राजनीतिक दिशा देने में जुटे प्रेमचंद्र बिंद से भाजपा की बातचीत भी हो रही है। 2012 में भाजपा व जनवादी पार्टी में गठबंधन हुआ था।
बताया जाता है कि सितंबर में रैली करके इसकी औपचारिक घोषणा करने पर सहमति लगभग बन गई है। रैली को राजनाथ सिंह, अमित शाह के साथ जनवादी पार्टी के अध्यक्ष संजय चौहान भी संबोधित करेंगे।
प्रदेश की आबादी में 54 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले पिछड़ों में राजभर व भर नाम से पहचानी जाने वाली विभिन्न उपजातियों की संख्या लगभग 3 प्रतिशत है।
पटेल, कुर्मी, कटियार व सचान जैसे नामों से अलग-अलग पहचान रखने वाली कुर्मियों की भागीदारी पिछड़ों में लगभग 8 प्रतिशत है।
इसी तरह विभिन्न नामों से पहचाने जाने वाले लोनिया व चौहान 2.44 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। कहार, कश्यप, केवट जैसी जातियां भी लगभग 6 प्रतिशत हैं।
अगर इन जातियों में 9 प्रतिशत मौर्य व लगभग 5 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले लोध को जोड़ दें तो भी पिछड़ों में यह आंकड़ा पिछड़ों में 32 प्रतिशत हिस्सेदारी से ऊपर निकल जाता है।
भाजपा रणनीतिकारों का यह आकलन ठीक ही है कि इन जातियों के साथ पाल, बघेल, तेली, बढ़ई, लोहार, भुर्जी जैसी कुछ और गैर यादव पिछड़ी व गैर जाटव दलित वोटों को पासी, वधिक, वाल्मीकि, धोबी, कोरी आदि को जोड़ लिया जाए तो अगड़ों को साथ लेकर सूबे की सत्ता पाने की राह को काफी हद तक आसान बनाया जा सकता है।